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पिता के कत्‍ल ने होनहार स्‍टूडेंट को बना दिया डॉन बृजेश सिंह
Friday, 05 July 2013 at 09:33 AM
By | Source bhaskarhindi.com
वाराणसी. माफिया डॉन बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की दिन दहाड़े हत्या से पूर्वांचल के लोगों में खौफ पैदा हो गया है। सभी को इस बात का डर सताने लगा है कि 80 के दशक का गैंगवार फिर से न शुरू हो जाए। बृजेश का भाई सतीश वाराणसी के चौबेपुर में चाय पी रहा था। उसी समय चार बाइक सवारों ने उस पर अंधाधुंध गोलियां चला दी।
 
इससे पहले डॉन के काले कारोबार को संभालने वाले राइट हैंड अजय खलनायक पर भी जानलेवा हमला हो चुका है। इन घटनाओं में माफिया डॉन मुख्तार अंसारी का नाम मुख्य साजिशकर्ता के रूप में सामने आ रहा है। 
 
पूर्वांचल की धरती पर माफियाओं का आतंक कोई नया नहीं है। इन माफियाओं की कहानी भी किसी फिल्‍मी स्क्रिप्‍ट से कम नहीं है। 80 के दशक से ही कई बार वर्चस्व और काले कारोबार को लेकर खूनी संघर्ष हो चुका है। जरायम की दुनिया में यूपी के कई माफियाओं ने सिर उठाने की कोशिश की लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ जब बृजेश सिंह और मुख़्तार अंसारी का नाम कोयले की ठेकेदारी में खूनी जंग को लेकर सामने आया।
 
इन दोनों के समानांतर जौनपुर के मुन्ना बजरंगी ने भी अपने गैंग को पूरे यूपी में सक्रिय कर दिया। वह पहले तो कांट्रेक्ट किलर के रूप में उभरा, लेकिन बाद में उसने मुख्तार से हाथ मिला लिया। 
 
बाप की हत्या ने होनहार बृजेश को बना दिया माफिया डॉन
27 अगस्त 1984 में वाराणसी के धरहरा गांव में रविन्द्र सिंह कि हत्या हरिहर सिंह और पांचू सिंह ने राजनितिक वर्चस्व के कारण कर दिया था। रविन्द्र सिंह के बेटे बृजेश ने उस समय इंटर की परीक्षा दिया था। जब रिजल्ट आया तो उसने अच्छे अंकों से परीक्षा पास कर ली।
 
उसके बाद उसने यूपी कालेज से बीएससी की पढाई की। उसका नाम होनहार छात्रों की श्रेणी में आता था। 
 
बृजेश ने पिता के हत्या का बदला लेने के लिए एक साल तक इंतजार किया। एक दिन उसका हरिहर सिंह से सामना हुआ। 27 मई 1985 को उसने हरिहर सिंह की हत्या कर दी। पहली बार होनहार लड़के का नाम पुलिस डायरी में दर्ज हुआ। उसके पिता की हत्या में गांव के कुछ और लोगों का हाथ था। 9 अप्रैल 1986 को सिकरौरा गांव में उसने एक बार फिर साथियों के साथ पांच लोगों को गोलियों से भून दिया। इस घटना में वह पहली बार गिरफ्तार हुआ। इसी दरमियान उसकी मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव में त्रिभुवन सिंह से हुई। धीरे-धीरे ये गैंग पूर्वांचल में सक्रीय होने लगा। दोनों ने मिलकर यूपी में शराब, रेशम, कोयला के धंधे के काले खेल में उतर गए। 
 

माफिया डॉन बृजेश का एम्पायर धीरे-धीरे बंगाल, मुंबई, बिहार, उड़ीसा तक फ़ैल गया। इस दरमियान डान अंडर ग्राउंड था। इसी समय एक गैंग और तेजी से उभर रहा था त्रिभुवन सिंह के पिता के हत्या आरोपी मकनू सिंह और साधू सिंह का।

गाजीपुर में मकनू की हत्या कर दी जाती है और आरोप रणजीत सिंह और साहब सिंह के ऊपर गया। इसी जगह से साधू सिंह और बृजेश गैंग के बिच खूनी जंग की शुरुआत हो गयी। 

 

अक्टूबर 1988 में वाराणसी पुलिस लाइन में तैनात त्रिभुवन सिंह के भाई हेड कांस्टेबल राजेंद्र सिंह की साधू सिंह ने हत्या कर दी। इस मामले में कैंट थाने में साधू सिंह, मुख़्तार अंसारी के साथ गाजीपुर के ही भीम सिंह पर मुकदमा दर्ज हुआ। 1990 में त्रिभुवन के भाई के हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश और त्रिभुवन सिंह ने पुलिस बनकर गाजीपुर अस्पताल में साधू सिंह को इलाज के दौरान गोलियों से छलनी कर दिया।
 
उस समय यूपी का सबसे चर्चित कांड रहा। साधू के गैंग की कमांड सीधे मुख़्तार अंसारी के पास आ गयी। बृजेश सिंह ने मुंबई के जेजे अस्पताल में घुसकर गावली गिरोह के शार्प शूटर हलधंकर समेत चार पुलिस वालों की हत्या कर दी।
 
इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यूपी समेत देश के कई राज्यों पर राज करता रहा। 2008 में बृजेश उड़ीसा से गिरफ्तार कर लिया गया। 
 
क्रिकेटर मुख्तार ऐसे बना माफिया डॉन
गाजीपुर मोहम्दाबाद के रहने वाले मुख़्तार अंसारी के परिवार में लोग शुरू से ही राजनीतिमें रहे हैं। तीन भाइयों में सबसे छोटे मुख़्तार कालेज लाइफ में एक बेहतरीन क्रिकेटर थे। 1988 में मुख़्तार के जीवन में बदलाव आया। राजनिति में एंट्री पाने में नाकामी मिली तो ठेकेदारी में घुस गए।
 
मंडी परिषद की ठेकेदारी को लेकर मुख़्तार ने सचिदानंद राय की हत्या कर दी। पहली बार मुख़्तार का नाम बड़े क्राइम में पुलिस फाइल में दर्ज हुआ। 
 
इसी दरम्यान अपने कट्टर दुश्मन त्रिभुवन सिंह के कांस्टेबल भाई राजेंद्र सिंह की हत्या बनारस में कर दी गयी। इसमें मुख़्तार का नाम ही सामने आया। 1991 में चंदौली में वह पकड़े गए। लेकिन रास्ते में दो पुलिस वालों को गोली मार फरार हो गए।
 
इस घटना के बाद बताया जाता है कि मुख़्तार ने अपने गैंग को दिल्ली और पंजाब से मजबूत किया। सरकारी ठेके, शराब के ठेके, कोयला के काले कारोबार को बाहर रहकर हैंडल करना शुरू किया।
 
1996 में मुख़्तार का नाम एक बार फिर सुर्ख़ियों में आया जब एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमला हुआ।
 
1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला 
व्यवसायी रुंगटा के अपहरण के बाद मुख़्तार अंसारी का नाम अपराध की दुनिया में पुरे देश पर छा गया। घर की राजनितिक छवि गड़बड़ाने के बाद भाई अफजल अंसारी कृष्णानद राय से चुनाव हार जाते हैं।
 
बताया जाता है कि बृजेश और कृष्णानद राय की नजदीकियां इस बीच काफी बढ़ गयी थी। भाई के हार से बौखलाए मुख़्तार ने शार्प शूटर मुन्ना बजरंगी और अतिकुर्रह्मान उर्फ़ बाबू की मदद से गोडउर के पास विधायक कृष्णानद राय की हत्या उनके पांच साथियों के साथ करा दिया। 
 
बताया जाता है कि पूर्वांचल की धरती पर पहली बार बृजेश गैंग को दहशत में डालने के लिए AK-47 का इस्तेमाल किया गया।
 
2005 में हुए मऊ दंगे के बाद मुख़्तार अंसारी ने समर्पण कर दिया। पूरा नेटवर्क जेल से संचालित होने लगा। बताया जाता है कि 2001 में बृजेश ने गाजीपुर के उसरी चट्टी के पास ट्रक से ओवर टेक कर मुख़्तार पर हमला किया था। उसमें ड्राइवर की मौत हो गयी। मुख़्तार बच गए। 
जेल में रहने के बाद गाजीपुर में सबसे करीबी भीम सिंह काले कारोबार को संभालते रहे।
 
इस बीच पूर्वांचल में वसूली, शराब ठेके, सरकारी टेंडर, कोयला को लेकर कई बार खूनी जंग दोनों गैंग के बीच हुआ।
 
गांव का गंवार बना खतरनाक कांट्रेक्ट किलर
मुन्ना बजरंगी ने अपनी भूमिका यूपी के अंदर कांट्रेक्ट किलर के रूप में बनायीं। वह बहुत जल्द बृजेश और मुख़्तार अंसारी के समातांतर तीसरे डान के रूप में उभर आया। प्रेम प्रकाश उर्फ़ मुन्ना बजरंगी ने पहली बार 1982 में सुरेरी गांव में मारपीट की घटना को अंजाम दिया। पुलिस की डायरी में धारा 147, 148, 323 IPC के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। 1984 में रामपुर थाने में मुन्ना के खिलाफ पहली बार हत्या और डकैती का मुदमा दर्ज हुआ। मुन्ना के क्राइम का ग्राफ तेजी से बढ़ने लगा। 
 
1993 में मुन्ना ने जौनपुर के लाइन बाज़ार थाना के कचहरी रोड पर दिन दहाड़े भाजपा नेता राम चन्द्र सिंह उनके सरकारी गनर अब्दुल्लाह समेत तीन लोगों के हत्या में नाम प्रकाश में आया।
 
इसके बाद मुन्ना ने वाराणसी का रुख कर लिया। कई वारदातों को अंजाम दिया। 1995 में उसने कैंट इलाके में छात्र नेता राम प्रकाश शुक्ल की हत्या कर दी। सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देते हुए उसने 1996 में रामपुर थाना के जमालपुर के पास AK-47 से ब्लाक प्रमुख कैलाश दुबे पंचायत सदस्य राजकुमार सिंह समेत तीन लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। 
 
मुन्ना ने अपना नेटवर्क धीरे-धीरे देश की राजधानी दिल्ली तक बना लिया। 1998 से 2000 के बीच उसने कई घटनाओं को वहां भी अंजाम दिया।
 
मुन्ना की छवि यूपी के अंदर एक कांट्रेक्ट किलर की बन गयी। व्यपारियों, डाक्टरों, सरकारी ठेकों में मुन्ना का हस्तक्षेप होने लगा। 2002 के बाद मुन्ना ने एक बार फिर से पूर्वांचल में पकड़ बनाने के लिए वाराणसी के चेतगंज में स्वर्ण व्यवसायी की दिन दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी। इस समय तक मुन्ना का अपराध की दुनिया में मुख़्तार अंसारी के लिए काम करने लगा। 
 
2005 में मुन्ना बजरंगी ने मुख़्तार अंसारी से बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का कांट्रेक्ट लिया और गोडउर के पास घटना को अंजाम भी दिया। इस घटना में मुन्ना ने अपराध के नयी इबारत को छुआ और विधायक समेत सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
 
फ़िलहाल वह कुछ मामलों में बरी भी हो चुका है। बताया जाता है कि इस घटना के बाद वह मुख़्तार का करीबी हो गया। पूर्वांचल के कई जिलों में वसूली का काम वही देखने लगा है।  
 
अपराध के प्रतीक अतीक 
वि‍धानसभा चुनाव में दि‍ए शपथ पत्र के मुताबिक हाईस्‍कूल फेल अतीक अहमद के खिलाफ 44 मामले विभिन्न थानों में दर्ज हैं। इसमें हत्या, हत्या की कोशिश समेत कई धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। गुंडा एक्ट, गैंगस्टर, 7 क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट और आयुध अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई है। अधिकांश संपत्तियों व वाहनों को सीज करने का जिक्र भी किया गया है। उनके खिलाफ 44 मामले शहर के सिविल लाइंस, धूमनगंज, खुल्दाबाद, कर्नलगंज, करेली, शाहगंज, कोतवाली, जार्जटाउन, कीडगंज थाने में दर्ज हैं। हजरतगंज, लखनऊ में भी मुकदमा दर्ज  है। सीबीआई ने भी रिपोर्ट दर्ज कराई है। इसमें हत्या के छह, हत्या की कोशिश के पांच और धोखधड़ी के चार मामले शामिल हैं।
 
हजरतगंज, लखनऊ में कई धाराओं में मुकदमा तो दर्ज है ही, एससी/एसटी एक्ट के तहत भी रिपोर्ट लिखी गई है। कई मामलों में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट भी लगा दी है। हालांकि, किसी मामले में उन्हें सजा नहीं हुई है। चल संपत्ति की बात करें तो अतीक अहमद के कई बैंक खाते कुर्क हैं। अचल संपत्ति की बात करें तो इसमें भी अधिकांश सीज हैं।
 
हालांकि, वह करोड़पति हैं। चल और अचल संपत्ति तीन करोड़ से अधिक है।
 
क्या एक बार फिर पूर्वांचल में होगा गैंगवार?
दो महीने के अंदर जिस तरह से डॉन बृजेश सिंह के करीबियों पर हमले हुए हैं, उससे यही लगता है कि पूर्वांचल में गैंगवार की स्थिति बन रही है। आईजी जोन जीएल मीणा ने बताया की 1984 के बाद से ही बृजेश अपराध की दुनिया में आया। धीरे-धीरे दुसरे ग्रुप में मुख़्तार अंसारी ने अपनी मजबूत जगह बना ली। कई बार दोनों गुटों के बीच खूनी खेल खेला गया। आपराधिक वर्चस्व के चलते कई हत्याएं हुईं।
 
पूर्व पत्रकार धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि बृजेश सिंह के पारिवारिक रंजीश ने धीरे-धीरे पूर्वांचल में अपराध को जन्म दिया। दो माफिया डॉनों की सरजमी को बना दिया। 
 
क्या है गैंगवार की मुख्य वजह?
 
गैंगवार के पीछे मुख्य रूप से कोयले का कला कारोबार, जो झारखंड, बिहार से लेकर यूपी तक फैला है। इसमें बृजेश और मुख़्तार कूद पड़े। दूसरा, रेशम व्यवसाय, मंडी परिषद, रेलवे, पीडब्लूडी के सरकारी ठेकों को लेकर दोनों ग्रुप ने यूपी की धरती को कई बार खून से लाल किया। बृजेश ने नए अपराध के ट्रेंड को जन्म दिया और पहली बार गाजीपुर जिला अस्पताल में पुलिस की वर्दी पहन अधिकारी बन हत्या किया।
 
आईजी जोन जीएल मीणा का कहना है कि दोनों ग्रुप में कई बार गैंगवार हो चुका है। उसरी चट्टी कांड, गोडउरहत्या कांड मुख्य़ उदाहरण है।
 

आईजी जीएल मीणा ने बताया मुख़्तार, बृजेश और मुन्ना बजरंगी कई मामलों से बरी भी हो चुके हैं। पिछले दो घटना से बीकेडी उर्फ़ इन्द्रदेव सिंह का नाम आ रहा है, जो निश्चित रूप से मुख़्तार गैंग के लिए काम कर रहा है। जांच की जा रही है कि कहीं कोई नया गैंग यूपी के अंदर तो नहीं सक्रीय हो रहा है। धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि कोयले का कारोबार हजारों करोड़ का है।

 

दोनों गुटों की नजर इस पर है। अब इन डॉनों का वर्चस्व पंजाब, हरियाणा, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, दिल्ली तक फ़ैल चुका है। 

 

राजा भैया 
 
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में कुंडा क़स्बे के निवासी राजा भैया का अपराध की दुनिया से पुराना संबंध है। भारतीय जनता पार्टी के एक असंतुष्ट विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने उनके ख़िलाफ़ अपहरण और यंत्रणा देने की शिकायत दर्ज करवाई। तब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं।
 
सरकार के आदेश पर पुलिस अधिकारी आर एस पांडेय के नेतृत्व में राजा भैया को तड़के गिरफ़्तार कर लिया गया और उन पर आतंकवाद विरोधी क़ानून (पोटा) लगाया गया। लेकिन 2003 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने राज्य विधानसभा चुनाव जीत लिया और सरकार में आते ही राजा भैया के ख़िलाफ़ पोटा के तहत आरोप वापिस ले लिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिर भी राजा भैया को रिहा करने से इनकार कर दिया, लेकिन राजा भैया को गिरफ़्तार करने वाले पुलिस अधिकारी आरएस पांडेय ने शिकायत दर्ज करवाई कि वह उन्हें परेशान कर रहे हैं। कुछ समय बाद आरएस पांडेय एक सड़क दुर्घटना में मारे गए। इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है।
 
पुलिस रिकॉर्ड में राजा भैया और उनके पिता उदयप्रताप सिंह दोनों को हिस्ट्रीशीटर बताया गया है। लेकिन दोनों अपराध के आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
 
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