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12 प्रकार के 'श्राद्ध', जानिए कौन-सा कब और क्यों किया जाता है ?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भविष्य पुराण के अंतर्गत 12 प्रकार के श्राद्धों का वर्णन किया गया है। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण, शास्त्रों में ये तीन प्रकार के ऋण बताए गए हैं, जिनमें पितृ ऋण अति महत्वपूर्ण बताया गया है। इस ऋण को श्राद्ध पक्ष के दौरान विधि-विधान से तर्पण, पिंडदान कर ही चुकाया जाता है। यहां हम आपको 12 प्रकार के श्राद्धों के बारे में बता रहे है... 

नित्य श्राद्ध : इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता है। ये प्रतिदिन किया जा सकता है। साथ ही इसे जल से भी संपन्न किया जा सकता है। 

नैमित्तक श्राद्ध: किसी की मृत्यु हाेने पर एकादशा आदि इसी श्राद्ध के अंतर्गत आता है। किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। इसमें भी विश्वेदेवों को स्थापित नहीं किया जाता है

काम्य श्राद्ध : किसी कामना पूर्ति के लिए किया जाने वाला श्राद्ध काम्य श्राद्ध के नाम से जाना जाता है।

वृद्धि श्राद्ध:  किसी मांगलिक अवसर पर इसे किया जाता है। जैसे जन्म या विवाद आदि मांगलिक कार्यों के समय। इसे नान्दीमुख श्राद्ध भी कहा जाता है।

सपिंडन श्राद्ध : इस श्राद्ध में पिण्डों को मिलाना होता है। मान्यता है कि जीव की मृत्यु के बाद वह प्रेत हो जाता है। प्रेत से पितर में ले जाने के लिए जाे प्रक्रिया अपनार्इ जाती है उसे सपिंडन श्राद्ध कहा जाता है।

पार्वण श्राद्ध : पितृपक्ष, अमावस्या या पर्व तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। इस श्राद्ध में विश्वेदेव की स्थापना की जाती है।

गोष्ठी श्राद्ध : ये श्राद्ध सामूहिक रूप से संपन्न किए जाते हैं। 

कर्मांग: षोडष संस्कारों के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है उसे कर्मांग श्राद्ध कहते हैं।

शुद्धयर्थ : शुद्धि हेतु जो श्राद्ध किया जाता है उसे शुद्धयर्थ श्राद्ध कहते हैं। इसमें ब्राह्मण-भोज आवश्यक होता है।

तीर्थ श्राद्ध: तीर्थ यात्रा में जाने के लिए किया जाता है। 

यात्रार्थ श्राद्ध : यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है। 

पुष्टयर्थ श्राद्ध : इन्हें शारीरिक अथवा आर्थिक उन्नति के निमित्त किया जाता है।

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