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450 साल पुरानी मस्जिद में मोदी और आबे, जानें क्यों है खास?

BhaskarHindi.com | Last Modified - September 14th, 2017 09:04 IST

डिजिटल डेस्क, अहमदाबाद। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे दो दिन के दौरे पर भारत आए हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे अहमदाबाद में मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन का शिलान्यास करेंगे। इसके अलावा दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते भी होंगे। लेकिन इन सबमें सबसे खास है, पीएम मोदी और शिंजो आबे का मस्जिद जाना। ये पहली बार हुआ है जब पीएम मोदी देश की किसी मस्जिद में गए। यहां पीएम मोदी ही शिंजो आबे के गाइड बने। उन्होंने शिंजो आबे और उनकी पत्नी को मस्जिद का हर कौना घुमाया। प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी पीएम शिंजो आबे और उनकी पत्नी को सीदी सैय्यद मस्जिद की अहमियत और इतिहास के बारे में भी बताया। 

क्या है मस्जिद का इतिहास?
ऐतिहासिक किताबों के मुताबिक, इस मस्जिद का निर्माण 1572 ईस्वी में शुरू किया गया और ये मस्जिद 1573 में बनकर तैयार हो गई। हालांकि इसका बाकी काम भी चल रहा था। इस मस्जिद को सिदी सैय्यद ने बनवाया है, इसलिए इसे सिदी सैय्यद मस्जिद के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जब मस्जिद का काम चल ही रहा था, तभी सिदी सैय्यद की मौत हो गई और मस्जिद का काम अधूरा रह गया, जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है। इतिहासकारों के मुताबिक सिदी सैय्यद के इंतकाल के बाद उन्हें इसी मस्जिद में दफना दिया गया, हालांकि यहां पर कोई मकबरा नहीं बना हुआ है। मुगलकाल में बनी ये मस्जिद अहमदाबाद की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पुराने समय में अफ्रीका से आकर जो लोग भारत में बस गए, उन्हें सिदी कहा जाता है। पहले ये काफी कमजोर थे, लेकिन धीरे-धीरे इनकी तादाद बढ़ती गई और ये ताकतवर हो गए।

यहां की जालियां है दुनियाभर में मशहूर
इस मस्जिद में कोई मीनार नहीं है लेकिन ये मस्जिद अपनी जालियों के कारण पूरी दुनियाभर में मशहूर है। अगर आप भी स्थापत्य कला से प्यार करते हैं, तो आपको एक बार इस मस्जिद में जरूर जाना चाहिए और यहां की जालियां देखना चाहिए। इस मस्जिद की खिड़कियों में जो जालियां बनाई गई है, उनकी खास बात ये है कि इन जालियों को छोटे-छोटे पत्थरों से जोड़कर बनाया गया है। दूर से देखने में ये जालियां एक नजर में तो वन पीस यानी एक ही पत्थर से बनी हुई दिखाई देती है, लेकिन असलियत ये है कि इसे छोटे-छोटे पत्थरों के टुकड़ों से जोड़कर बनाया गया है। मस्जिद की खिड़कियों पर बनाई गई इन जालियों की नक्काशियां पूरी दुनिया में मशहूर है और इसे सिदी सैय्यद की जाली भी कहते हैं। यहां की जालियां ही इसकी खासियत है और इसे IIM अहमदाबाद के लोगो में भी शामिल किया गया है। ये भी कहा जाता है कि इस मस्जिद को मराठाओं ने अस्तबल बनाकर इस्तेमाल किया था, लेकिन बाद में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान लॉर्ड कर्जन ने इसकी देखभाल और रखरखाव का काम शुरू किया। 

रूस के प्रिंस और इंग्लैंड की महारानी भी इसकी दीवानी
इस मस्जिद में जो नक्काशी की गई है, उसके दीवाने पूरी दुनिया में है। इस मस्जिद में लोग सिर्फ इसकी जालियां देखने ही आते हैं। इस मस्जिद के दीवानों की लिस्ट निकाली जाए तो उसमें काफी बड़े-बड़े नाम भी शामिल हैं, जैसे- इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ और उनके प्रिंस, रुस के आखिरी क्राउन प्रिंस। कहा जाता है कि एक बार 1969 में इंग्लैंड के प्रिंस भारत आए थे और जब उन्हें मोमेंटो दिया गया तो उसपर इस मस्जिद की जालियों की डिजाइन बनी हुई थी। इन जालियों को देखकर प्रिंस इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत इस मस्जिद में जाने का मन बना लिया। बताया जाता है कि प्रिंस साबरमती आश्रम से सिर्फ इस मस्जिद को देखने के लिए अहमदाबाद आ गए थे। 

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