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संकष्टी चतुर्थी 2017 : विघ्नों से मुक्ति के लिए रखें ये व्रत

BhaskarHindi.com | Last Modified - September 07th, 2017 09:57 IST

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं। भगवान गणेश जो ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च हैं सभी तरह के विघ्न हरने के लिए पूजे जाते हैं। इसलिए यह माना जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल जाती है। इस बार यह 9 सितंबर शनिवार को मनाया जा रहा है। 

सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास

हालांकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर माह में होता है, लेकिन पूर्णिमांत पंजांग के अनुसार सबसे मुख्य संकष्टी चतुर्थी माघ के महीने में पड़ती है और अमांत पंजांग के अनुसार पौष के महीने में पड़ती है। भगवान गणेश के भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से चन्द्रोदय तक उपवास रखते हैं। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिलनाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है।

संकटहरा चतुर्थी 

उत्तर भारत में माघ माह के दौरान पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को संकट चौथ के नाम से जाना जाता है। वहीं तमिलनाडु में संकष्टी चतुर्थी को गणेश संकटहरा या संकटहरा चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। संकष्टी चतुर्थी के लिए उपवास का दिन चन्द्रोदय पर निर्धारित होता है। जिस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र उदय होता है उस दिन ही संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इसलिए कभी-कभी संकष्टी चतुर्थी का व्रत, चतुर्थी तिथि से एक दिन पूर्व तृतीया तिथि के दिन पड़ जाता है।

कठिन है व्रत 

संकष्टी चतुर्थी का उपवास बेहद कठिन बताया गया है, जिसमें केवल फलों, जड़ों (जमीन के अन्दर पौधों का भाग) और वनस्पति उत्पादों का ही सेवन किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, आलू और मूंगफली व्रतधारियों का मुख्य आहार होते हैं। श्रद्धालु लोग चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को खोलते हैं। संकटों आैर जीवन में अाने वाले कष्टाें काे दूर करने के लिए ये व्रत अवश्य रखना चाहिए।

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