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यहां पूजी जाती है भगवान शिव की पीठ, पढे़ं केदारनाथ मंदिर के रोचक FACTS

डिजिटल डेस्क, रुद्रप्रयाग। केदारनाथ मंदिर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से लगाए जाने वाले तड़ित चालक यंत्र का तीर्थ पुरोहित कड़ा विरोध कर रहे हैं। हिंदु धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक केदारनाथ में अब ये मामला बढ़ता जा रहा है। श्रद्धालु मामले में अपने विचार भी रखे हैं। मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं पर भी बात हो रही है। इसी कड़ी में आज यहां हम आपको मंदिर से जुड़े कुछ ऐसी ही जरूरी बातें और रोचक FACTS बताने जा रहे हैं...


1. उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदारनाथ में से भी एक है।

2. उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ ये दो प्रधान तीर्थ हैं। इन दोनों तीर्थों के बारे में कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता हैए उसे तीर्थ पुण्य प्राप्त नहीं होता। 

3. यह मन्दिर एक 6 फीट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। इसके निर्माण के संबंध में कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होता, किंतु ये माना जाता है कि इसका निर्माण आदि गुरू शंकराचार्य ने कराया था।

4. केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। ये परंपरा यहां बरसों पुरानी बताई जाती है। केदारनाथ  हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर स्थित है। 

5. शीतकाल में केदारघाटी बर्फ से ढंक जाती है। यद्यपि मंदिर खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता हैए किन्तु यह सामान्यतरू नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व (वृश्चिक संक्रान्ति से दो दिन पूर्व) बंद हो जाता है और 6 माह बाद अर्थात वैशाखी (13-14 अप्रैल) के बाद कपाट खुलता है।

ऐसी है कथा  

बताया जाता है कि पांडवा भात्र हत्या के पास से मुक्ति पाने शिव के दर्शन चाहते थे, लेकिन भोलेनाथ उनसे नाराज थे तो उन्हें दर्शन देने तैयार नहीं थे। वे उन्हें ढूंढने जगह-जगह गए। पांडव जहां भी जाते भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो जाते। बाद में शिव केदारनाथ आ गए। इस पर पांडव भी उन्हें तलाशते यहां पहुुंचे। पांडवो को देखते ही महादेव ने बैल का रूप रख लिया। भीम ने उन्हें पहचान लिया और दो चट्टानों पर अपना विशाल शरीर फैला लिया। सभी जीव-जंतु, पशु उनके पैर के नीचे से निकल गए, लेकिन शिव रूपी बैल नहीं निकले। तब भीम ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन बैल के पीठ का त्रिकोणाकार हिस्सा ही उनके हाथ आया, किंतु तब तक शिव पांडवों पर प्रसन्न हो चुके थे। अतः उन्हें ने पापमुक्त किया और केदारनाथ में उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति (पिंड) के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। 

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