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अनूठी परंपरा: मिल गए है गांव के नए दामाद जी, रात गुप्त स्थान पर करेंगे आराम, होलिका दहन के बाद सुबह होंगे गधे पर सवार - जुटेगा मजमा और उड़ेगा गुलाल

Beed News. सुनिल चौरे. महाराष्ट्र के बीड जिले में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि एक दिलचस्प और सौ साल पुरानी कहानी की जीवित परंपरा है। विडा येवता नामक गांव में होली का दिन आते ही पूरे गांव की निगाहें उस खास शख्स की तलाश में लग जाती हैं, जो अभी अभी नया दामाद बना हो।
परंपरा की शुरुआत – एक जिद और एक अनोखा उपाय
कहानी करीब सौ साल पुरानी है। गांव के ठाकुर आनंद देशमुख परिवार के एक नए दामाद ने होली पर रंग लगवाने से साफ इनकार कर दिया। ससुर ने समझाया, मनाया, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने एक अनोखी युक्ति सोची।
गांव में एक गधे को फूलों से सजाया गया। दामाद को उस पर बिठाया गया, गले में जूते-चप्पलों की माला पहनाई गई और पूरे गांव में जुलूस निकाला गया। लोग हंसी-मजाक करते, ढोल-नगाड़े बजते और जुलूस मंदिर तक पहुंचा। वहां दामाद की आरती उतारी गई। फिर उन्हें नए कपड़े और सोने की अंगूठी भेंट की गई, मुंह मीठा कराया गया और अंत में रंग लगाया गया। बस, उसी दिन से यह परंपरा गांव की पहचान बन गई।
होली का खास दिन और सबसे नए दामाद की तलाश
होली से पहले गांव में खोज अभियान शुरू हो जाता है। हाल ही में शादी हुए दामाद की पहचान की जाती है। कई दामाद इस रस्म से बचने के लिए “रणनीतिक रूप से गायब” भी हो जाते हैं। कोई रिश्तेदारी में चला जाता है, तो कोई शहर लौट जाता है, लेकिन गांव के युवा भी कम नहीं। वे पूरी निगरानी रखते हैं ताकि परंपरा हर हाल में निभाई जा सके। होलीका दहन की रात दामाद को गांव लाकर गुप्त स्थान पर रखा जाता है। नाम और ठिकाना राज़ रखा जाता है, ताकि कहीं वह भाग न जाए!
एक बार का सम्मान
इस परंपरा में हर दामाद को जीवन में सिर्फ एक बार ही गधे की सवारी का अवसर मिलता है। सुबह लगभग 10 बजे जुलूस निकलता है। पूरा गांव—बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं—हंसी-ठिठोली के बीच इस अनोखी रस्म का हिस्सा बनते हैं। पहले दामाद थोड़ा “ना-नु” करता है, लेकिन अंत में मुस्कुराते हुए इस परंपरा को स्वीकार कर लेता है। सवारी के बाद उसे सम्मानपूर्वक नए वस्त्र, उपहार और मिठाई दी जाती है।
बदलता समय और घटती संख्या
गांव के सरपंच सुरज पटाईत के अनुसार, पहले कृषि कार्यों में गधों का खूब उपयोग होता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बीड जिले में गधों की संख्या कम हुई है।
इस बार भी दो अलग-अलग टीमें गधा और दामाद खोजने निकलीं और दोनों की तलाश सफल रही।
सामाजिक एकता का संदेश
इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें जाति, धर्म या वर्ग का कोई भेदभाव नहीं। गांव का हर दामाद समान रूप से इस रस्म का भागीदार बनता है। हंसी-मजाक के बीच यह परंपरा आपसी मेलजोल और सामाजिक एकता का संदेश देती है।
2025 में थम गया था रंग
वर्ष 2025 में मस्साजोग गांव के सरपंच संतोष देशमुख की हत्या के बाद पूरे क्षेत्र में शोक की लहर छा गई थी। उस वर्ष विडा येवता गांव में यह सौ साल पुरानी परंपरा रद्द करनी पड़ी, लेकिन अब फिर वही जोश, वही उत्साह लौट आया है। होली के रंगों के साथ गधे की सवारी की यह अनोखी कहानी एक बार फिर गांव की गलियों में गूंजने को तैयार है।
Created On :   2 March 2026 7:50 PM IST











