Jabalpur News: जागरूकता बढ़ने से घटा अंधविश्वास, जल्दी डायग्नोस हो रहे मरीज

जागरूकता बढ़ने से घटा अंधविश्वास, जल्दी डायग्नोस हो रहे मरीज
वर्ल्ड मूवमेंट डिसऑर्डर डे आज } मेडिकल कॉलेज में हर सप्ताह 5% मरीज इसी के, लक्षण पहचानें और समय पर इलाज कराएं

Jabalpur News: जिन बीमारियों को पहले अंधविश्वास से जोड़ा जाता था, आज उनके प्रति जागरूकता आने के बाद मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। मूवमेंट डिसऑर्डर से जुड़ी बीमारियां इन्हीं में से एक है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज स्थित सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में हर सप्ताह 5 प्रतिशत मरीज ऐसे पहुंच रहे हैं, जो कि मूवमेंट डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। वहीं समस्या बढ़ने पर न्यूरो सर्जरी विभाग में हाईटेक सर्जरी भी की जा रही हैं।

इस समस्या से पीड़ित मरीज 50 से अधिक उम्र के होते हैं। मूवमेंट डिसऑर्डर कई प्रकार के होते हैं, लेकिन उन सभी में एक बात समान है कि लक्षणों को जितना जल्दी पहचाना जाए, उपचार उतना ही अधिक प्रभावी होता है। यदि ऐसे लक्षण 1-2 महीने से बने हुए हैं, तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट अथवा न्यूरोसर्जन से परामर्श लेना आवश्यक है। मूवमेंट डिसऑर्डर लाइलाज नहीं है पर समय पर पहचान, सही दवाइयां और उचित सर्जिकल विकल्प किसी भी मरीज की जिंदगी बदल सकते हैं। पूरी दुनिया में आज वर्ल्ड मूवमेंट डिसऑर्डर डे लोगों को जागरूक करने के लिए सेलिब्रेट किया जाता है।

क्या है मूवमेंट डिसऑर्डर

हमारे शरीर की हर गतिविधि जैसे कि चलना, हाथ हिलाना, बोलना, लिखना आदि दिमाग और नसों के जटिल नेटवर्क के कारण संभव होती है। जब इस प्रणाली में कोई असंतुलन होता है, तो व्यक्ति को मूवमेंट डिसऑर्डर यानी चलने-फिरने या शरीर की गति में समस्या होने लगती है।

सर्जरी की हाईटेक तकनीकों का हो रहा प्रयोग

सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग की हेड डॉ. नम्रता चौहान, न्यूरो सर्जन डॉ. जितिन बजाज, न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अनुमिति जैन ने बताया कि अस्पताल में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस), घाव सर्जरी (पेलीडोटॉमी और थैलामोटॉमी), इंट्राथेकल पंप/बोटुलिनम टॉक्सिन थेरेपी सहित उन्नत न्यूरो-इमेजिंग और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी-आदि तकनीकों से मरीजों को लगातार उपचार दिया जा रहा है। यह सुविधा मध्य भारत में कुछ ही केंद्रों पर है।

इन लक्षणों को न करें अनदेखा

{हाथों या सिर में कंपकंपी

{चलने में धीमापन या पैरों का

घिसटकर चलना

{शरीर में कड़ापन या अकड़न

{आवाज धीमी पड़ना

{संतुलन बिगड़ना, बार-बार गिरना

{हाथ-पैर में अनियंत्रित मरोड़

{चेहरे के हाव-भाव कम होना

{दवाइयों के बाद बार-बार

अनचाही हरकतें

क्यों जरूरी है समय पर इलाज

विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती अवस्था में दवाइयां अत्यंत प्रभावी होती हैं। देर होने पर रोग के लक्षण बढ़ सकते हैं और दवाइयों की मात्रा या संख्या बढ़ानी पड़ती है। लंबे समय में जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है जैसे कि चलना, खाना, कपड़े पहनना, लिखना कठिन हो सकता है। उपचार के लिए दवाइयां, फिजियोथेरेपी एवं पुनर्वास के साथ उन्नत सर्जरी जैसे विकल्प मौजूद हैं।

इससे जुड़े कुछ मिथक और तथ्य

मूवमेंट डिसऑर्डर केवल बुजुर्गों को होता है, ऐसा नहीं है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है, बच्चों में भी। लगातार कंपकंपी एक न्यूरोलॉजिकल समस्या का संकेत हो सकता है। यह भी मिथक है कि मूवमेंट डिसऑर्डर का इलाज नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि इसका उपचार हो सकता है। यह संक्रामक नहीं है।

Created On :   29 Nov 2025 2:23 PM IST

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