इतिहास : आदिवासियों को अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बिरसा मुंडा ने एकजुट किया था

July 23rd, 2022

डिजिटल डेस्क, नागपुर, चंद्रकांत चावरे| महारानी राज तुुुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना' यह आदिवासी भाषा में एक नारा है, जो 1895 में बिरसा मुंडा ने अंगरेजों के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट करने के लिए दिया था। इस नारे का अर्थ है विक्टोरिया महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो। रांची में जन्मे बिरसा मुंडा का एक पुतला नागपुर के फुटाला तालाब परिसर में स्थापित किया गया है। इसकी देखभाल गोंडवाना बहुद्देशीय संस्था द्वारा की जाती है। जिले के आदिवासी समाज ने शहर में बिरसा मुंडा का पुतला स्थापित करने की मांग की थी। समाज के आर्थिक योगदान से 2016 में यह पुतला तैयार कर नागपुर महानगर पालिका द्वारा दी गई जमीन पर स्थापित किया गया। अन्याय-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले आदिवासी कांतिकारियों में बिरसा मुंडा का प्रथम स्थान है। देश में बिरसा मुंडा को स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्तों की सूची में स्थान दिया गया है। वहीं आदिवासी समाज के लिए बिरसा मुंडा ‘धरती आबा’ यानी पृथ्वी के पिता हैं। संतरानगरी में उनका पुतला स्थापित होना गर्व की बात है। 

article by anuj kumar sinha on prabhat khabar editorial about birsa munda  anniversary srn | Birsa Munda Jayanti : बिरसा के साथी नायक अब भी गुमनामी में

देखभाल के लिए विशेष टीम होनी चाहिए

राजेश परतेकी, सचिव, गोंडवाना बहुउद्देशीय संस्था के मुताबिक वीर बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के लिए पूजनीय है। उनका पुतला स्थापित करने के लिए मनपा से जमीन की मांग कर पुतला स्थापित किया गया। यहां दिन विशेष पर कार्यक्रम होते हैं। इसके लिए समाज सहयोग करता है। पुतले के रखरखाव के लिए संस्था और स्थानीय लोग मदद करते हैं। वहां का सौंदर्यीकरण बना रहे, इसका नियमित रखा जाता है। मनपा ने शहर के महापुरुषों व संत-महात्माओं के पुतले की देखभाल, सौंदर्यीकरण व गरिमा बनाए रखने के लिए विशेष टीम बनानी चाहिए। 

Birth Anniversary Of Freedom Fighter Birsa Munda To Be Celebrated As  Janjatiya Gaurav Divas On 15

बिरसाइट नामक एक पंथ की शुरुआत की

भारत के आदिवासी जनजाति समुदाय में से मुंडा समाज सबसे बड़ा है। बिरसा मुंडा भी इसी समाज में जन्मे थे। 15 नवंबर 1875 को उनका जन्म रांची जिले के उलीहातु गांव में हुआ था। उनके पिता सुगना मुंडा किसान थे। मां का नाम करमी था। गरीबी के कारण बिरसा का बचपन अभाव में बीता। वे अपने चाचा के यहां अयूभाटू गांव में पले बढ़े। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक मिशन स्कूल में हुई। यहां धर्म परिवर्तन कर उनका नाम बिरसा डेविड किया गया। कुछ साल बाद उन्होंने स्कूल छोड़ ईसाई धर्म त्याग दिया। उन्होंने आदिवासियों के रीति-रिवाजों व प्रथाओं को बचाए रखने और सांस्कृतिक लोकाचार बनाए रखने के लिए अपने पुरखा देवताओं काे पूजने पर जोर दिया। उन्होंने बिरसाइट नामक एक पंथ की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य गैरआदिवासियों, जमींदारों व अंगरेज सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना था। इस उद्देश्य के बाद बिरसा मुंडा ने आंदाेलन कर तीनाें के नीति-नियमों का विरोध कर उन्हें जवाब देना शुरू किया था। इसलिए बिरसा मुंडा को शोषणकर्ता गैरआदिवासी, जमींदार व अंगरेज अपनी आंख की किरकिरी मानने लगे थे।

15 नवंबर को मनाया जाता है "जनजातीय गौरव दिवस'

अगस्त 1897 में बिरसा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमान के सहारे खुंटी थाने पर हमला किया। 1898 में तांगा नदी के किनारे आदिवासियों व अंगरेज सेना से हुई भिड़ंत में सेना हार गई, बाद में अनेक आदिवासियों को गिरफ्तार कर ताकत कम कर दी गई। जनवरी 1900 में डोंबरी पहाड़ बिरसा मुंडा की सभा थी। वहां घेराबंदी करने पर संघर्ष हुआ। कई महिलाएं और बच्चे मारे गए। बिहार, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल सहित विदर्भ के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा जाता है। रांची में कोकर के पास डिस्टिलरी पुल के समीप उनकी समाधी है। रांची में ही बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार और बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय विमानतल है। सालभर पहले सरकार ने बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाने की घोषणा की है।

वीर बिरसा मुंडा / बलिदान दिवस – 9 जून, 1900 | VSKgujarat

जंगलों में होती थीं सभाएं

जेल से रिहा होने के बाद बिरसा मुंडा और आदिवासी समुदाय अधिक आक्रामक हुआ। जंगलों में सभाएं आयोजित कर आंदोलन के लिए जागरूकता की जाने लगी। महारानी विक्टोरिया का पुतला बनाकर तीरंदाजी सीखने लगे। 1899 में हिंसक आंदाेलन शुरू हुआ। सरकार और मिशनरी के खिलाफ जोरदार विद्रोह किया गया। रांची और सिंहभूम में पुलिस, गैर आदिवासी, जमींदार, अंगरेज आदि आदिवासियों का निशाना बने। इस विद्रोह का दमन करने के लिए सरकार ने पुलिस और सेना की मदद से छापामार कार्रवाई शुरू की। इसमें अनेक आदिवासियों को जान गंवानी पड़ी। 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल में बिरसा मुंडा गिरफ्तार किए गए। उन्हें रांची के जेल में रखा गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। इस बीच 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के बाद छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट पारित हुआ। 

Today, the birth anniversary of 'Birsa Munda', a symbol of tribal valor, PM  Narendra Modi salutes| आदिवासी पराक्रम के प्रतीक 'बिरसा मुंडा' की जयंती आज,  पीएम मोदी ने किया नमन | Hindi

हजारीबाग जेल में दो साल की सजा भी काटी

19 साल की उम्र में 1894 में बिरसा मुंडा ने पहला आंदोलन किया। उस समय अकाल की स्थिति को देखते हुए सरकार को लगान देने से इनकार कर दिया। इसके लिए उन्होंने आदिवासियों को एकजुट कर सरकार के खिलाफ जागरूक किया था। तब तक आदिवासी मुंडा समाज के पास कोई नेतृत्वकर्ता नहीं था। बिरसा मुंडा के आंदाेलन ने उनके भीतर एक चेतना जगाई और तब से आदिवासी समाज अन्याय-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगा। बिरसा मुंडा के इस आंदोलन के कारण छोटा नागपुर पठार अंतर्गत आने वाले व आसपास के सभी गांव के आदिवासी उनके साथ जुड़ते गए। इसमें युवाओं की संख्या अधिक थी। यहां से उन्हें धरती आबा के नाम से पुकारा जाने लगा। 1 अक्टूबर 1994 को आदिवासियों को एकत्रित कर एक बड़ी सभा ली थी, जिसमें एकस्वर में अंगरेज सरकार को लगान माफ करने को कहा गया। साथ ही आदिवासी समुदाय ने लगान नहीं देने का फैसला भी कर लिया। इससे अंगरेज सरकार तिलमिला गई थी। 1895 में विद्रोह फैलाने और राजविरोधी षड्यंत्र रचने के लिए बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में दो साल कैद रखा गया। 

Birsa munda stand against the british rule and fight for their land 1 -  Satyahindi

सभागृह बनाने के प्रस्ताव को मिली मंजूरी

नागपुर में भी आदिवासियों के लिए बिरसा मुंडा पूजनीय हैं। जिले में आदिवासी जनजातीय आबादी 2.40 लाख से अधिक है। नागपुर में संत-महापुरुषों के अनेक पुतले स्थापित हैं। इसलिए गोंडवाना बहुउद्दशीय संस्था के राजेश परतेकी, पूर्व महापौर माया इवनाते, चिंतामन इवनाते सहित समाज के लोगों ने मनपा प्रशासन से जमीन की मांग की थी। 2016 में मनपा ने आदिवासियों को बिरसा मुंडा का पुतला स्थापित करने के लिए जमीन दी। समाज के लोगों द्वारा आर्थिक योगदान से बिरसा मुंडा का सीमेंट का पुतला बनवाया गया। 2016 में ही फुटाला के किनारे बिरसा मुंडा का पुतला स्थापित किया गया। संस्था के अध्यक्ष पंकज आत्राम अन्य सदस्य सागर उमरे, अमित मसराम, कमलेश मसराम, विशाल गेडाम, पंकज गौर आदि सहित समाज के सहयोग से पुतले का रखरखाव किया जाता है। इस परिसर में बिरसा मुंडा की जयंती व 9 अगस्त को आदिवासी दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। परिसर के सटकर ही खुली जमीन पर वीर बिरसा मुंडा सभागृह बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है। इसके लिए विधायक विकास ठाकरे द्वारा 50 लाख रुपए की निधि उपलब्ध कराई गई है। आदिवासी विकास महामंडल को वीर बिरसा मुंडा का नाम देने की मांग की जा रही है।