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नगर निगम को 85 लाख की चपत लगाने की तैयारी!

September 30th, 2019 15:05 IST
नगर निगम को 85 लाख की चपत लगाने की तैयारी!

डिजिटल डेस्क कटनी । उपयंत्रियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण जर्जर सडक़ों की मरम्मत कराने के लिए नगर निगम को अपने खजाने से 85 लाख रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं। बारिश से सडक़ों में गड़बड़ी सामने आई। जिसमें कहीं पर डामर ने गिट्टी का साथ छोड़ दिया तो कहीं पर सीसी सडक़ों की ऊपर सतह पर अब गिट्टी ही नजर आ रहा है। डबलूबीएम सडक़ों से भी मुरुम और मिट्टी बारिश में बह गई।  दो से तीन वर्ष के अंतराल में परफारमेंस मद से दर्जनों सडक़ें बनाई गईं। इस दौरान परफारमेंस के रुप में ठेकेदार से दस प्रतिशत की राशि भी जमा कराई गई, लेकिन जिस समय मरम्मत का काम उपयंत्रियों को ठेकेदार से कराया जाना था। उस समय तक वे नींद में सोए रहे। जिससे अब नगर निगम को राजस्व से रुपए फूंकने पड़ेंगे। इस संबंध में नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि परफारमेंस मद के तहत जो सडक़ें बनाई गई है। उसे लेकर ठेकेदार को नोटिस दिया गया है।
इस तरह से चला खेल
विभाग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस खेल को अच्छी तरह से वार्डों के उपयंत्री और ठेकेदार खेलते हैं। सडक़ बनाते समय जिस मापदण्ड का पालन किया जाना चाहिए। उस मापदण्ड से उपयंत्री आंख बंद कर लेते हैं। चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए इस तरह का खेल-खेला जाता है। उपयंत्रियों की कोशिश होती है कि परफारमेंस मद के तहत हुए निर्माण कार्यों की गारंटी पीरियड को किसी तरह से निकाला जाए। तीन वर्ष पूरा होने के बाद दस प्रतिशत राशि बची हुई राशि ठेकेदार को दे देते हैं। इसके अगले वर्ष ही सडक़ों के मरम्मत का काम शुरु हो जाता है। जिसमें ठेकेदार की जगह पर नगर निगम को रुपए खर्च करने पड़ते हैं। नेहरू वार्ड क्रमांक में 18 लाख की सडक़ बरगंवा क्षेत्र के नेहरु वार्ड में बीएसएनएल आफिस के समीप बनाई गई सीसी सडक़ लापरवाही की कहानी बंया कर रही है। यह सीसी सडक़ वर्ष 2015 में बनकर तैयार हुई थी। तीन वर्ष तक की गारंटी रही। गारंटी पीरियड में सडक़ में कई जगहों पर गड्ढे हो गए। इसके बावजूद ठेकेदार से मरम्मत का कार्य नहीं कराया गया। तीन वर्ष पूरा होने के बाद अब निगम को ही अपने खजाने से मरम्मत के लिए राशि खर्च करनी पड़ेगी।
कटायेघाट में 20 लाख खर्च
कलेक्ट्रेट मार्ग से कटाये घाट मार्ग का काम तो से तीन हिस्सों में किया गया है। पुल तक का मार्ग डामरीकृत है, तो इसके आगे सीसी सडक़ बनाई गई है। फिलटर प्लांट के आगे से पुल तक जो सीसी सडक़ बनीं है। उसे सात से आठ माह ही हुए हैं, और ऊपरी सतह पर गिट्टियां ही दिखाई दे रही हैं। फिलटर प्लांट के पास सडक़ का एक बड़ा टुकड़ा टूट जाने से इसकी चौड़ाई कम हो गई है।
शहर में कई सडक़ें खराब
शहर के किसी कोने में आप चले जांए। जर्जर सडक़ को देखकर आप गुणवत्ता का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। शहर के अंदर करीब दो दर्जन से अधिक सडक़ें खराब हैं। जहां पर पैदल चलने पर राहगीर घायल होते रहते हैं, तो वाहन चालक भी हिचकोले खाते रहते हैं। जानकार कह रहे हैं कि सर्वे में हीला-हवाली के चलते इस तरह की स्थिति बनती है। उपयंत्रियों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे सडक़ों का सर्वे कर यथास्थिति से उच्चाधिकारियों को अवगत कराएं। जिससे ठेकेदार से गारंटी अवधि में रिपेयरिंग का कार्य कराया जा सके।
इनका कहना है
शहर की एक दर्जन सडक़ें ऐसी हैं। जिसमें मरम्मत के लिए करीब 85 लाख रुपए शासन या नगर निगम को खर्च करने पड़ेंगे। इसमें वे सडक़ें शामिल हैं। जिनकी गारंटी अवधि समाप्त हो चुकी है। गारंटी पीरियड में खराब सडक़ों की मरम्मत को लेकर ठेकेदारों को नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
- राकेश शर्मा, कार्यपालन यंत्री नगर निगम कटनी
 

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क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

डिजिटल डेस्क, श्रीनगरजम्मू कश्मीर की सीमा के आसपास ड्रोन की हलचलें लगातार तेज होती जा रही हैं। इसके बाद भारत ने भी ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है कि ड्रोन की इस तरह की गतिविधियां न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से घातक साबित हो सकती हैं। इस हमले के बाद से भारत में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में जानिए आखिर ड्रोन है क्या और यह कैसे ऑपरेट होते हैं? इसके इस्तेमाल और इससे क्या नुकसान हो सकता है और देश में ड्रोन्स को उड़ाने को लेकर सरकार की क्या गाइडलाइन्स हैं।

ड्रोन क्या होता है?
ड्रोन्स को UAV यानी Unmanned aerial vehicles या RPAS यानी Remotely Piloted Aerial Systems भी कहा जाता है। आम बोल चाल वाली भाषा में इसे मिनी हैलिकॉप्टर भी कहते हैं। अक्सर शादी के दौरान फोटोग्राफी के लिए आपने ड्रोन का इस्तेमाल होते हुए देखा होगा। यह एक ऐसा यंत्र है, जिसमें एचडी कैमरे, ऑनबोर्ड सेंसर और जीपीएस लगा होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। इसके चारों और 4 रोटर्स लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह आसमान में ऊंचा उड़ने में सक्षम होता है। एक ड्रोन का वजन 250 ग्राम से लेकर 150 किलोग्राम से भी ज्यादा हो सकता है।

ड्रोन को उड़ाने के लिए सॉफ्टवेयर, जीपीएस और रिमोट की आवश्यकता होती है। रिमोट के जरिए ही ड्रोन को ऑपरेट और कंट्रोल कर सकते हैं। ड्रोन पर लगे रोटर्स की गति को रिमोट की जॉयस्टिक के जरिए कंट्रोल किया जाता है। वहीं, जीपीएस दिशाएं बताता हैं, जीपीएस दुर्घटना होने से पहले ही ऑपरेटर को चेतावनी भेज देता है। 

ड्रोन हमले किस तरह से हो सकते हैं?
ड्रोन का इस्तेमाल कई देशों की सेनाएं कर रही हैं, क्योंकि ये साइज में छोटे होते हैं इसलिए रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आ पाते हैं, साथ ही दुर्गम इलाकों में भी गुपचुप घुसपैठ कर सकते हैं। यही कारण है कि सेना में इनका इस्तेमाल बढ़ने लगा है।ड्रोन हमले दो प्रकार से संभव हैं। एक तरीका ये है कि ड्रोन में हथियार या विस्फोटक लगा दिए जाते हैं और ड्रोन इन हथियारों या विस्फोटक को लक्ष्य पर ड्रॉप कर देता है। ड्रोन से हमले का दूसरा तरीका है ड्रोन को खुद ही एक विस्फोटक में बदल दिया जाए। 

कितने घातक हो सकते हैं ड्रोन हमले?
ये ड्रोन के प्रकार और पेलोड पर निर्भर है। पेलोड मतलब ड्रोन कितना वजन अपने साथ लेकर उड़ सकता है। ड्रोन की पेलोड क्षमता जितनी ज्यादा होगी वो अपने साथ उतनी ज्यादा मात्रा में विस्फोटक सामग्री लेकर उड़ सकता है। अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन अपने साथ 1700 किलो तक वजन ले जाने में सक्षम हैं।

ड्रोन से अबतक के बड़े हमले
2020 में अमेरिका ने ईरानी मेजर जनरल सुलेमानी को मार गिराया था। इससे पहले 2019 में यमन के हूती विद्रोहियों ने साऊदी अरब की अरामको ऑयल कंपनी पर ड्रोन हमला किया था। पाकिस्तान के वजीरिस्तान में 2009 के दौरान एक ड्रोन हमले में 60 लोग मारे गए थे।

देश में ड्रोन्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन्स 
देश में नागरिक उड्डयन मंत्रालय(Ministry of Civil Aviation) ने ड्रोन उड़ाने पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ड्रोन के वजन और साइज के अनुसार इन प्रतिबंधों को कई वर्ग में बांटा गया है।

1.नेनो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं पड़ती।

2.माइक्रो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए UAS Operator Permit-I से अनुमति लेनी पड़ती है और ड्रोन पायलट को SOP(Standard operating procedure) का पालन करना होता है। 

इनसे बड़े ड्रोन उड़ाने के लिए डीजीसीए से परमिट(लाइसेंस ) की आवश्यकता होती है। अगर आप किसी प्रतिबंधित जगह पर ड्रोन उड़ाना चाहते हैं तो इसके लिए भी आपको डीजीसीए से अनुमति लेनी पड़ेगी। बिना अनुमति के ड्रोन उड़ाना गैरकानूनी है और इसके लिए ड्रोन ऑपरेटर पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है।

ड्रोन उड़ाने के लिए प्रतिबंधित जगह

  • मिलिट्री एरिया के आसपास या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका।
  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 5 किलोमीटर और नेशनल एयरपोर्ट के 3 किलोमीटर का दायरा।
  • इंटरनेशनल बॉर्डर के 25 किलोमीटर का दायरा ।
  • इसके अलावा ड्रोन की कैटेगरी को मद्देनजर रखते हुए इन्हें कितनी ऊंचाई तक उड़ाया जा सकता है वो भी निर्धारित है।

ड्रोन उड़ाने के लिए जरूरी हैं लाइसेंस
नैनो ड्रोन्स को छोडकर किसी भी तरह के ड्रोन्स को उड़ाने के लिए लाइसेंस या परमिट की जरूरत पड़ती है।ड्रोन उड़ाने के लिए लाइसेंस दो कैटेगरी के अंतर्गत दिए जाते हैं, जिसमें पहला है स्टूडेंट रिमोट पायलट लाइसेंस और दूसरा है रिमोट पायलट लाइसेंस।इन दोनों लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए ड्रोन ऑपरेटर की न्यूनतम उम्र 18 साल और अधिकतम 65 साल होनी चाहिए। लाइसेंस के लिए ऑपरेटर कम से कम 10वीं पास या 10वीं क्लास के बराबर उसके पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से डिग्री होना अति आवश्यक हैं।आवेदन करने वाले व्यक्ति को डीजीसीए स्पेसिफाइड मेडिकल एग्जामिनेशन भी पास करना जरूरी है। लाइसेंस के लिए बैकग्राउंड भी चेक होता है।

जुर्माने का प्रावधान

  • बिना लाइसेंस उड़ाने पर 25000 रुपए का जुर्माना।
  • नो-ऑपरेशन जोन यानी प्रतिबंधित क्षेत्र में उड़ान भरने पर 50000 रुपए का जुर्माना।
  • ड्रोन का थर्ड पार्टी बीमा ना होने पर 10000 रुपए का जुर्माना लग सकता है।