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राम के देश में निकले रावण को चाहने वाले, कहा रावण हमारे आराध्य, दहन पर लगाएं रोक

राम के देश में निकले रावण को चाहने वाले, कहा रावण हमारे आराध्य, दहन पर लगाएं रोक

डिजिटल डेस्क छिंदवाड़ा। रावण जलाने का विरोध करते हुए सोमवार को आदिवासी समाज के लोगों ने रावण दहन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना था कि रावण आदिवासी समाज के देवता है जिसके दहन से आदिवासी समाज की आस्था को ठेस पहुंचती है। इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए।
बड़ी संख्या में पहुंचा आदिवासी समाज-
बड़ी संख्या में कलेक्ट्रेट पहुंचे आदिवासी समाज के लोगों ने तहसीलदार महेश अग्रवाल को ज्ञापन सौंपते हुए बताया कि रावण महाज्ञानी और कुशल शासक और नारियों का सम्मान करने वाले थे। पूर्व कथाओं में कई ऐसे लोग हुए जिन्होंने नारियों का अपमान किया। इसके बाद भी जब इन लोगों का पुतला दहन नहीं किया जाता है तो आदिवासी समाज जिन्हें अपने आराध्य के रूप में पूजता है उसका दहन क्यों किया जा रहा है।
समाप्त की जाए परंपरा-
इतिहास गवाह है कि गोंड राजाओं ने 1750 वर्षों तक एकछत्र राज्य किया और प्रकृति को ही अपना देवता मानते आए हैं। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी आदिवासियों की शक्ति को वे परास्त नहीं कर पाए। अंग्रेजों ने 1910 में संपूर्ण साहित्य को जला दिया। बाद में मनुवादियों ने भ्रम फैला कर रावण दहन की शुरुआत की। इसलिए रावण दहन की इस परंपरा को खत्म किया जाना चाहिए।

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