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मंडला: धान के रोग एवं कीट से बचाव के लिए कृषकों को सुझाव

September 10th, 2020 16:57 IST
मंडला: धान के रोग एवं कीट से बचाव के लिए कृषकों को सुझाव

डिजिटल डेस्क, मंडला। मंडला उपसंचालक किसान तथा कृषि विकास से प्राप्त जानकारी अनुसार नाइट्रोजन की अधिक मात्रा उपयोग करने से धान पर जीवाणु पत्ती अंगमारी, तना गलन, बदरा एवं अभासी कंगयारी आदि रोगों का प्रकोप बढ़ता है। उत्तरी-पश्चिमी भारत में पाया गया कि 15 जुलाई से पहले की रोपाई में बदरा एवं बंट का प्रकोप कम होता है, जबकि देर से रोपाई करने पर अभासी कंगयारी का संक्रमण घटता है। कुछ किस्में रोग-रोधिता की महत्व की ओर ध्यान आकर्षित कराया क्योंकि रोग-रोधी किस्मों की उपलब्धता से रासायनिक नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होगी और साथ ही वातावरण दूषित होने से बचेगा। रोगों का विस्तार तापमान एवं अन्य जलवायु संबधी कारकों पर निर्भर करता है साथ ही सस्य क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है। ब्लास्ट रोग के लक्षण ब्लास्ट पत्त्यिों पर कत्थें धब्बे नाव आकार के रहते है, जो रोग बढ़ने पर पूरी पत्तियों एवं तना पर कत्थाई रंग के धब्बे बन जाते हैं, ये लक्षण यदि धान की फसल में दिखाई दें तो ट्राई साईक्लाजोल 120 ग्राम प्रति एकड़, ट्यूबो कोनाजोल 200-250 ग्राम प्रति एकड़ पर दवाओं का स्प्रें करना चाहिए। धान में जीवाणु झुलसा (बेक्टीरियल ब्लाईट) रोग के लक्षण वर्तमान में धान की फसल में झुलसा का प्रकोप देखा जा रहा है, इसके लक्षण पत्तियों, बाली की गरदन एवं ताने की निचली गठानों पर प्रमुख रूप से दिखाई देता है। प्रारंभिक अवस्था में निचली पत्तियों पर हल्के बंेगनी रंग के छोटे-छोटे धब्बे बनते है, जो धीरे-धीरे आंख के समान बीच में चौडे़ व किनारों पर सकरे हो जाते है। इन धब्बो के बीच का रंग हल्के भूरे रंग का होता है, जिससे दानो के भरने पर प्रभाव पड़ता हैं। फसल काल के दौरान रात्रि का तापमान 20 से 22 सेल्सियस व आद्रता 95 प्रतिशत से अधिक होती है, तब इस रोग का प्रकोप होने की संभावना अधिक रहती है। इसके नियंत्रण के लिए रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही हीनोसान या बाविस्टीन का 0.1 प्रतिशत रासायन का छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतर में करना चाहिए। तना छेदक के लक्षण धान की फसल में तना छेदक कीट का प्रकोप अक्सर देखने को मिलता है, जो कि कनसे निकलने के बाद गठान के पास कीट के द्वारा अंदर से काट दिया जाता है और अगर उस पौधे को ऊपर से खींच कर देखें तो पूरा तना निकलकर बाहर आ जाता है, जिससे बाली बनने की संभावना खत्म हो जाती है। इसके नियंत्रण के लिए तना छेदक के नियंत्रण के लिए कार्टप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 150 से 250 ग्राम प्रति एकड़ या कोराजन 20:7 मिली ग्राम या करबो फ्यूरान 10 किलो ग्राम या क्लोरीपायरीफॉस एवं प्रोफेनोफॉस मिश्रित दवा का 400 मिली लीटर छिड़काव करें। केशवर्म के लक्षण इस कीट के द्वारा पत्ति की उपरी सतह की क्लोरोफिल को खुरच-खुरच कर खा जीती है, जिससे पत्ति सफेद दिखाई देने लगती है और पौधा सूखने लगता है, इसका प्रकोप पेडों के नीचे या पानी भरे हुए खेतो में ज्यादा देखने को मिलता है। छांव वाली जगह से पानी का निकास करें। इसके नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरीफॉस एवं प्रोफेनोफॉस मिश्रित दवा का 400 मिली लीटर (प्रति एकड़) छिड़काव करें।

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