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Pune city News: सात महीने में 35 लोगों को नई रोशनी देने वाले 'आपटे काका'

- सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक श्रीकांत आपटे स्व खर्च पर कर रहे हैं नेत्रदान का जन-जागरूकता अभियान
- सात महीने में 35 सफल नेत्रदान
भास्कर न्यूज, पिंपरी-चिंचवड। अधिकांश लोगों के लिए सेवानिवृत्ति का अर्थ होता है आराम, विश्राम और खाली समय का जीवन। लेकिन चिंचवड निवासी श्रीकांत मुरलीधर आपटे के लिए, सेवानिवृत्ति एक नए समाज-धर्म की शुरुआत बन गई है। बैंक ऑफ महाराष्ट्र में वरिष्ठ प्रबंधक के पद से रिटायर होने के बाद, उन्होंने खुद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में रोशनी भरने का संकल्प लिया। और आज, उनके इस संकल्प ने 35 परिवारों को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने का काम किया है।
जानकारी का अभाव बना प्रेरणा
मुंबई में काम करते समय, 'देहदान' की संकल्पना ने आपटे काका के मन को छू लिया था। जब उन्हें इस बारे में जानकारी जुटाने में एक महीना लगा, तो उनके मन में यह दृढ विचार आया, "यदि जानकारी आसानी से नहीं मिल रही है, तो इसे लोगों तक पहुंचाने का काम मैं खुद करूंगा!" सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने यह संकल्प पूरा किया। आज, वह राज्य स्तरीय ऑर्गन डोनेट समिति के सदस्य के रूप में कार्यरत हैं और नेत्रदान के बारे में समाज को जागरूक करना ही उनका मुख्य लक्ष्य बन गया है।
सात महीने में 35 सफल नेत्रदान
आपटे काका ने 5 मई 2025 को वाईसीएम अस्पताल के शवगृह से समुपदेशन की शुरुआत की। 3 जून 2025 को उन्हें पहला नेत्रदान प्राप्त करने में सफलता मिली... और उसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। पिछले सात महीनों में, उन्होंने 35 मृत व्यक्तियों के रिश्तेदारों को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया है। इन 35 'दृष्टि दानों' के कारण, समाज के 35 लोग अब एक नया जीवन जी रहे हैं।
खुद के खर्च पर जन-जागरूकता
आपटे काका ने नेत्रदान के संबंध में विभिन्न पोस्टर, सूचना पट्ट और मार्गदर्शन सामग्री तैयार की है। इसके लिए उन्होंने किसी से एक रुपया भी नहीं लिया है। वह अपना सारा खर्च स्वयं की पेंशन से करते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अब तक 21 हज़ार छात्रों को ऑनलाइन मार्गदर्शन दिया है। उनके लिए यह कार्य केवल सामाजिक नहीं, बल्कि भावनात्मक प्रतिबद्धता है। वे इस काम के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं।
मृत शरीर से क्षमा मांगने की प्रार्थना
आपटे काका सिर्फ आंखे दान नहीं करवाते, बल्कि वह लोगों के जीवन से अंधकार दूर कर रहे हैं। उनका एक अनूठा अभ्यास भी है। वे नेत्र बैंक के डॉक्टरों से कहते हैं कि नेत्रदान स्वीकार करने से पहले मृत शरीर के सामने पार्थिव शरीर से क्षमा मांगें और प्रार्थना करें, क्योंकि उस मृत शरीर और परिवार के निर्णय के कारण ही किसी के जीवन में प्रकाश आने वाला होता है।
"मुझे इस काम से सामाजिक प्रतिबद्धता निभाने का संतोष मिलता है। मेरे बाद यदि मेरी आंखे किसी अन्य ज़रूरतमंद को लाभ पहुंचा सकती हैं, तो दान देने में क्या हर्ज है? दृष्टिहीनता के कारण कई लोगों का जीवन अंधकारमय हो गया है। आइए, उन्हें दृष्टि का प्रकाश देने का प्रयास करें।"
- श्रीकांत मुरलीधर आपटे
Created On :   29 Nov 2025 3:23 PM IST












