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Pune City News: रोटी गांव में परंपरा और कानून के टकराव पर मंथन

भास्कर न्यूज, पाटस। महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में विधवाओं के केशमुंडन और सती जैसी अमानवीय कुप्रथाओं पर कानूनन बहुत पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया है। ब्रिटिश काल से लेकर छत्रपती शिवाजी महाराज के समय तक राष्ट्रमाता जिजाऊ ने भी ऐसी अनिष्ट रूढ़ियों का कड़ा विरोध किया था। इसी संदर्भ में दौंड तहसील के रोटी गांव में प्रचलित 'जावल विधी' (मुंडन परंपरा) को लेकर महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की सचिव नंदिनी आवाडे ने स्थानीय महिलाओं और नागरिकों के साथ विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरदार शितोले-देशमुख परिवार की महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और उच्च शिक्षित युवाओं को महिलाओं के मुंडन की इस प्रथा पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
दौंड तहसील के रोटी स्थित श्री रोटमलनाथ मंदिर में पारंपरिक 'जावल विधी' के दौरान महिलाओं के मुंडन की प्रथा प्रचलित है। इस मामले में राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा रूपाली चाकणकर ने हाल ही में पुणे जिलाधिकारी को निर्दश दिए थे कि वे इस प्रथा की जांच कर सात दिनों के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपें। आयोग की इस सख्त भूमिका का रविवार को स्थानीय स्तर पर तीखा विरोध हुआ था, जहां शितोले-देशमुख परिवार ने सभा आयोजित कर अध्यक्षा चाकणकर के आदेश का निषेध किया था। इसी तनावपूर्ण पृष्ठभूमि के बीच वस्तुस्थिति को समझने के लिए आयोग की सचिव नंदिनी आवाडे ने शुक्रवार को स्वयं रोटी गांव का दौरा किया।
श्रद्धा और इतिहास का हवाला
ग्राम पंचायत कार्यालय में आयोजित चर्चा के दौरान पूर्व सभापति आशा शितोले, पूर्व सरपंच अवंतिका शितोले, छाया शितोले और पुलिस पाटिल रेश्मा शितोले सहित अनेक महिलाओं ने अपनी बात रखी। उन्होंने सचिव को बताया कि यह जावल प्रथा कोई नई नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक काल से चली आ रही है और उन्हें इस परंपरा पर गर्व है। महिलाओं ने पुरजोर तरीके से कहा कि मुंडन के लिए उन पर किसी भी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं की जाती। वे अपनी स्वेच्छा और अटूट श्रद्धा के कारण अपने बाल अर्पित करती हैं। ग्रामीणों का तर्क था कि इसमें न तो कोई अंधविश्वास है और न ही महिलाओं का मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न होता है। उन्होंने यह भी कहा कि शितोले परिवार छत्रपति शिवाजी महाराज के काल से सरदार और क्षत्रिय रहा है और यह परंपरा उनकी पहचान का हिस्सा है।
विवेकपुर्ण निर्णरू लेने का सुझाव
उपस्थित जनसमूह और महिलाओं की बातें सुनने के बाद सचिव नंदिनी आवाडे ने कानून की स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार ऐसी प्रथाओं पर प्रतिबंध है जो महिलाओं की गरिमा को प्रभावित करती हैं, हालांकि इस प्रथा को जारी रखना है या बंद करना है, इसका अंतिम निर्णय समाज को ही लेना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि शितोले परिवार आज उच्च शिक्षित है और उनके सदस्य विदेशों में भी कार्यरत हैं, ऐसे में समाज में उनका स्थान बहुत प्रतिष्ठित है। आवाडे ने जोर देकर कहा कि भले ही महिलाओं की सहमति हो या न हो, मुंडन जैसी प्रथाओं पर कानून की अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने समाज से अपील की कि वे बदलती परिस्थितियों और कानून के सम्मान को ध्यान में रखते हुए इस पर विवेकपूर्ण निर्णय लें।
इस चर्चा के दौरान पुणे विभागीय उपायुक्त संजय माने, तहसीलदार अरुण शेलार, बीडीओ अरुण मरभल और पुलिस निरीक्षक नारायण देशमुख उपस्थित थे। साथ ही अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की पदाधिकारी नंदिनी जाधव और संदीप काले ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अतिरिक्त ग्राम पंचायत के प्रशासनिक अधिकारी दिलीप जगताप, ग्रामसेवक संजय सकट सहित आंगनवाड़ी सेविकाएं और शितोले-देशमुख परिवार की बड़ी संख्या में महिलाएं व वरिष्ठ नागरिक इस संवाद का हिस्सा बने।
Created On :   3 Jan 2026 3:43 PM IST












