दैनिक भास्कर हिंदी: Film Review: 'कड़वी हवा' में संजय मिश्रा ने दिखाई 'किसान और सूखे' की सच्चाई

November 24th, 2017

रेटिंगः 3.5 स्टार
डायरेक्टरः नीला माधव पांडा
कलाकारः संजय मिश्रा, रणबीर शौरी, तिलोत्तमा शोम, भूपेश सिंह
समय: 1 घंटा 40 मिनट

डिजिटल डेस्क, भोपाल। किसानों की बेबसी और गांव में सूखे की जमीनी हकीकत दिखाती फिल्म 'कड़वी हवा' में बॉलीवुड अभिनेता संजय मिश्रा ने शानदार अभिनय किया है। निर्देशक नीला माधव पांडा ने फिल्म ‘कड़वी हवा’ का निर्देशन किया है। नीला माधव इससे पहले 'आई एम कलाम’ और 'जलपरी' जैसी फिल्म भी बना चुके हैं। नीला माधाब को पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह से हमने अपने पर्यावरण को खराब किया है जिसकी वजह से हवा का रुख बदल गया है। किसान इसकी चपेट में आ रहे हैं और सूखे की मार से फसलें बर्बाद हो रही हैं।

फिल्म ‘कड़वी हवा’ एक गांव से शुरू होती है, जहां जबरदस्त सूखा पड़ा है। किसानों की खेती बर्बाद हो चुकी है। इस क्षेत्र में बैंक की तरफ से कर्ज वसूली के लिए एजेंट आता है, जिसे वहां के लोग यमदूत बोलते हैं, क्योंकि जब-जब वो गांव में आता है कोई न कोई अपनी जान दे देता है। किसान कर्ज तले दबे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में एक दिव्यांग पिता अपने बेटे मुकुंद को बैंक के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए उस एजेंट से कुछ अनोखी डील कर लेता है, इस डर से कि कहीं ये ‘कड़वी हवा’ उसे भी न निगल ले। दिव्यांग पिता के रोल में संजय मिश्रा हैं और रणवीर शौरी ने वसूली एजेंट के रोल को निभाया है।

इस फिल्म में जबरदस्ती का मनोरंजन या नाच गाना डालने की कोशिश नहीं है। शुरू से अंत तक विषय पर गंभीरता बनी हुई है। ये एक आर्टिस्टिक फिल्म है, जिसमे मनोरंजन के मसाले नहीं मिलेंगे फिर भी इसे आपको देखनी चाहिए। ये फिल्म आपको बताती है कि पर्यावरण को हमारी जरूरत है और इसे बचाने कि जिम्मेदारी हमारी है। इस फिल्म में कोई स्टार या मसाला नहीं है, मगर मौजूदा हालात में ऐसी फिल्म की बहुत सख्त जरूरत है।

फिल्म में रणवीर शौरी आपको विलेन लगेंगे मगर जब उनकी मजबूरी फिल्म में देखेंगे तो वो भी आपका दिल छु लेगी। रणवीर और संजय ने अपने अपने किरदारों में जान डाली है। 'आई एम कलाम’ के बाद एक बार फिर नीला माधव पांडा ने बेहतरीन तरीके से फिल्म बनाई है, जिसे देखकर लगता है कि हम उस गांव के हिस्सा हैं। फिल्म बहुत ही रियलिस्टिक ढंग से बनाई गई है। गरीबों और किसानों के रहन-सहन, उनकी मजबूरी को बड़ी सच्चाई से परदे पर उतारा गया है।

फिल्म का बजट 10 करोड़ रुपये से कम बताया जा रहा है। फिल्म का म्यूजिक अच्छा है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी के साथ-साथ चलता है। आखिर में आने वाली गुलजार साहब की पंक्तियां दिल को छू जाती हैं। फिल्म में दिखाए गए सच्चाई वाले आंकड़े सोचने पर विवश भी करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि मौसम के बदलाव और हवाओं के रुख के बारे में बहुत बड़ी बात यह फिल्म कह जाती है।