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मूवी रिव्यू : बाप-बेटे के खट्टे मीठे रिश्ते की कहानी है 102 नॉट आउट

September 05th, 2018 17:53 IST

फिल्म - 102 नॉट आउट
निर्देशक - उमेश शुक्ला
स्टारकास्ट - अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर
जॉनर - कॉमेडी
म्यूजिक - सलीम- सुलेमान, जॉर्ज जोसेफ
रेटिंग - 3.5 स्टार

डिजिटल डेस्क, मुंबई । एक्टर अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर पूरे 21 साल बाद एक फिर सिल्वर स्क्रीन पर एक साथ नजर आए। फिल्म '102 नॉट आउट' में दोनों कलाकार बाप-बेटे के रूप में दिखाए दिए। फिल्म का निर्देशन उमेश शुक्ला ने किया है। फिल्म में कोई हीरोइन नहीं है, लेकिन इसकी कमी फिल्म में दिखाई गई लोकेशन्स ने पूरी कर दी। कुछ जगह फिल्म में इतनी खूबसूरत है कि अगर हीरोइन होती भी तो उनके आगे हीरोइन की खूबसूरती भी फीकी नजर आती। इस फिल्म की एक और खासियत ये भी रही की दो दमदार किरदार के साथ बहुत सारे किरदार नहीं दिखाए गए। महज 1 घंटे 24 मिनट की इस फिल्‍म में पर्दे पर अमिताभ बच्‍चन, ऋषि कपूर और जिमित त्रिवेदी ही नजर आएंगे, जो आपको हसाएंगे, रुलाएंगे और प्‍यार-मस्‍ती जैसे कई इमोशन्‍स से रूबरू कराएंगे।

फिल्म में ज्यादा तामझाम ना समेटते हुए केवल स्टोरी और अदाकारी पर ध्यान दिया गया है। पूरी कहानी बुजुर्ग पिता और बुजुर्ग बेटे के खट्टे-मीठे रिश्ते के आस-पास घूमती है। ये सिंपल सी कहानी को आप पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं।

कहानी: यह कहानी है एक ऐसे पिता दत्तात्रेय (अमिताभ बच्‍चन) की जो 102 साल का है और दुनिया में सबसे ज्‍यादा जीवित रहे चीन के व्‍यक्ति का रिकॉर्ड तोड़ना चाहता है। बेहद जिंदादिल दत्तात्रेय का बोरिंग और बोझिल जिंदगी जी रहा बेटा है बाबूलाल (ऋषि कपूर), जो 75 साल का है और जिसने खुद को बुजुर्ग व्‍यक्ति के तौर पर स्‍वीकार कर लिया है। एक दिन दत्तात्रेय घर आते ही घोषित करता है कि वो अपने 75 साल के बेटे को वृद्धाश्रम भेजेगा। यह सुनते ही बाबू बैचेन हो उठता है और अपने पिता से ऐसा न करने की गुहार लगाता है। अपने बेटे को वृद्धाश्रम न भेजने की एवज में ये पिता अपने बेटे के सामने कुछ शर्तें रखता है और उसे वो सारी शर्तें माननी पड़ती हैं। आखिर क्‍या हैं ये शर्तें और क्‍यों एक बाप, अपने बेटे के साथ यह सब कर रहा है, ये जानने के लिए तो आपको सिनेमाघर तक जाना होगा।

इमोशंस से भरी सिंपल कहानी 

'102 नॉट आउट' की कहानी काफी साधारण है, लेकिन इसे निर्देशक उमेश शुक्‍ला की तारीफ ही कहेंगे कि उन्‍होंने इस सिंपल से प्‍लॉट को मजेदार इमोशंस की चाशनी से सजा कर पेश किया है। फिल्‍म ज्‍यादा लंबी नहीं है, तो बोरियत महसूस नहीं होती। वरना तीन किरदारों और एक घर में बनाई गई इस फिल्‍म का हश्र खराब हो सकता था। फिल्‍म के पहले सीन से ही आपके चेहरे पर एक मुस्‍कान ठहर जाएगी और फर्स्‍ट हाफ आपको मुस्‍कान से सीधे हंसी और ठहाकों के सफर पर ले चलेगा। फर्स्‍ट हाफ में कई सीन ऐसे हैं, जहां जमकर हंसी आती है, लेकिन फिल्‍म का सेकंड हाफ हंसी के साथ ही फिल्‍म की तहें खोलने लगता है और आप कई तरह की भावनाएं महसूस करेंगे।

उमेश शुक्‍ला ने यह फिल्‍म एक गुजराती नाटक से प्रेरित होकर बनाई है। ऐसे में ये फिल्‍म भी काफी नाटकीय अंदाज में ही पर्दे पर नजर आई है। हां ये जरूर कह सकते हैं कि अगर आप अपने माता-पिता से दूर रह रहे हैं तो फिल्‍म के आखिर में सिनेमाघर से निकलते हुए आपको उनसे एक बार बात करने का जरूर मन कर सकता है।

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