comScore

 5.67 करोड़ का सरकारी प्रोजेक्ट बना कबाड़, अब होगी नीलामी

 5.67 करोड़ का सरकारी प्रोजेक्ट बना कबाड़, अब होगी नीलामी

डिजिटल डेस्क, चंद्रपुर। प्रदूषण कम करने, इको फ्रेंडली उद्योग लगाने व 500 से अधिक बेरोजगारों को नौकरी का सपना दिखाने वाली हाई फ्लाई ऐश क्लस्टर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, केंद्र सरकार से मिली 5.67  करोड़ की निधि खर्च करने के बाद अब कबाड़ में तब्दील हो चुकी है। बीते 6 वर्षों सेे यहां एक भी उत्पाद नहीं बन पाया है। उल्लेखनीय है कि यहां ईंट बनाने के साथ ही पेंट और अन्य कई  इको फ्रेंडली उत्पाद बनने वाले थे। सरकार, प्रशासन एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अलावा इस कंपनी के संचालक इस उद्योग को शुरू नहीं करा पाए। मौजूदा बदहाली को देखकर लगता है कि सरकारी अनुदान का बंटाधार करने की नीति  अपनाने के कारण यह इंटस्ट्री शुरू होने के पहले ही बंद हो गई। फिलहाल खानापूर्ति के लिए कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार ने इसकी नीलामी के लिए राज्य स्तर पर निर्देश दिए हैं।

क्यों लौटाने पड़े 2.42 करोड़ ?

घुग्घुस मार्ग पर मौजूद एमआईडीसी में 5 हेक्टेयर जमीन कौडिय़ों के दाम प्राप्त करने के बाद यहां केंद्र सरकार की सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम मंत्रालय की ओर से  सूक्ष्म और लघु उद्यम - क्लस्टर विकास कार्यक्रम के तहत करोड़ों की निधि से उद्योग खड़ा करने के लिए शहर के 12 नामी उद्योगपतियों ने वर्ष 2009  में हाई फ्लाई ऐश क्लस्टर प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई। 13.50 करोड़ की लागत से फ्लाई ऐश की ईंटें बनाने के साथ ही अन्य कई उत्पादों  को बनाने की इंडस्ट्री का प्रस्ताव केंद्र सरकार से मंजूर करवाया गया था। इस कंपनी को 13.50 करोड़ रुपए केंद्र सरकार से अनुदान मिलना तय था। फरवरी 2012 में पहली किश्त 8.10 करोड़ की निधि मिली। वर्ष 2009 से 29  अक्टूबर 2013 तक कुल 8.10 करोड़ में से 5 करोड़ 67 लाख 29 हजार 487 रुपए की राशि इस कंपनी ने खर्च कर दी। एमआईडीसी में ढांचा व अन्य आवश्यक सामग्री तथा वाहन उपलब्ध करवा दिए गए परंतु निर्धारित समय पर यूटिलाइजेशन का प्रमाणपत्र पेश नहीं किए जाने से शेष 2 करोड़ 42 लाख 70 हजार 513 रुपए की राशि राज्य सरकार ने केंद्र को लौटा दी। 

नीलामी से सरकार को होगा करोड़ों का घाटा

सरकारी अनुदान का सही समय पर उचित उपयोग नहीं हो पाने के कारण बीते 6 वर्षों में कंपनी की सारी मशीनरी व संसाधनों में जंग लग चुका है। सामग्री जहां के तहां पड़े-पड़े सड़ चुकी हैं। भंगार में तब्दील हो चुकी इस संपत्ति को यदि केंद्र सरकार प्रशासन एवं राज्य सरकार के माध्यम से नीलाम भी करती है तो 5.67 करोड़ की तुलना में यहां 1 करोड़ की राशि भी प्राप्त नहीं हो पाएगी। ऐसे में कंपनी के 12 उद्योगपति प्रवीण जानी, चंद्रकांत गुप्ते, शेखर पद्मावार, प्रदीप बुक्कावार, मेघनाद जानी, नितीन पुगलिया, जुझार सिंह माटा, प्रमोद चव्हाण, अरुण घोटेकर, हेमंत कुलकर्णी, डॉ. कीर्तिवर्धन दीक्षित व चंद्रकांत वासाड़े से सरकार कैसे अनुदान की राशि वसूलेगी यह तय करना मुश्किल है। राजनीतिक कनेक्शन व रसूख के चलते अनुदान की निधि वसूलना तथा कार्रवाई करना सरकार व प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर बन चुका है। 

अधिकारी कहते है शुरू कराएंगे उद्योग

जिला उद्योग केंद्र के जिला उद्योग अधिकारी चेतन पाटील का दावा है कि भले ही ६ वर्ष बीत गए हैं, देरी हुई है, परंतु हम इस क्लस्टर को शुरू करावाकर रहेंगे परंतु पाटील यह नहीं बता पाए कि भंगार हो चुकी संपूर्ण सामग्री से उत्पादों का निर्माण कैसे किया जा सकेगा। पाटील कहते है कि यह संपूर्ण मामला राज्य सरकार के मंत्रालय स्तर पर चल रहा है। जिला उद्योग केंद्र से इसका कोई संबंध नहीं है। उनके विभाग द्वारा कोई पत्राचार नहीं किया जाता है।  

प्रोजेक्ट अधूरा रहने से समस्या

प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है। केंद्र सरकार से शेष निधि मिलने की उम्मीद है। निधि आते ही शेष कार्य किया जाएगा। यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट पेश न कर पाने के कारण दिक्कतें हुई हैं। शीघ्र ही प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाएगा।  
-मेघनाद जानी, संचालक, हाई फ्लाई एश क्लस्टर प्रा.लिमिटेड

पर्याप्त निधि नहीं मिली 

केंद्र सरकार ने इस फ्लाई एश क्लस्टर के लिए आवश्यक व शेष निधि नहीं दी। योजना राज्य व केंद्र सरकार के स्तर की है। जिला उद्योग केंद्र से इसका कोई संबंध नहीं है। यहां से कोई पत्राचार नहीं किया जाता। इस क्लस्टर के संदर्भ में मुंबई में २० जून को उद्योग संचालनालय के डेवलपमेंट कमिश्नर डॉ. हर्षदीप कांबले की मौजूदगी में बंद पड़े उद्योगों को शुरू कराने के संदर्भ में चर्चा हुई परंतु नीलामी व अन्य जानकारी हम मीडिया से साझा नहीं कर सकते।
- चेतन पाटील, जिला उद्योग अधिकारी,  जिला उद्योग केंद्र, चंद्रपुर 

कमेंट करें
R45Sw