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2001 में हुआ था संसद पर हमला, जानें क्या हुआ था उस दिन? 

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 13th, 2017 10:32 IST

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 13 दिसंबर 2001, ये वही तारीख है, जब लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद पर हमला हुआ था। ठंड का मौसम था और संसद भवन में मौजूद सांसद और पत्रकार धूप का आनंद ले रहे थे। उस दिन करीब 11 बजे संसद स्थगित हो गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी वहां से जा चुके थे। इसके बाद संसद के गेट पर सांसदों की सफेद गाड़ियों का तांता लग गया। फिर वो हुआ, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। 5 आतंकवादी सफेद एंबेसडर कार में सवार होकर संसद में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में पुलिस के जवान समेत 9 लोग शहीद हो गए थे। आज संसद हमले को 16 साल हो चुके हैं और उस हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरू को फांसी भी दी जा चुकी है, लेकिन आज भी जब 13 दिसंबर आती है, तो उस हमले की यादें ताजा हो जाती हैं।


धूप का आनंद ले रहे थे सांसद

2001 की वो 13 दिसंबर, ठंड का मौसम था और बाहर धूप खिली हुई थी। सुबह-सुबह यहां पहुंचकर कुछ सांसद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, तो कुछ खिली हुई धूप का आनंद ले रहे थे। संसद में विंटर सेशन चल रहा था और पिछले कुछ दिनों से यहां पर 'महिला आरक्षण बिल' पर हंगामा जारी थी। इस दिन भी इस बिल पर चर्चा होनी थी, लेकिन 11:02 बजे संसद को स्थगित कर दिया। इसके बाद उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी संसद से जा चुके थे। तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत का काफिला भी निकलने ही वाला था। संसद स्थगित होने के बाद गेट नंबर 12 पर सफेद गाड़ियों का तांता लग गया। इस वक्त तक सबकुछ अच्छा था, लेकिन चंद मिनटों में संसद पर जो हुआ, उसके बारे में न कभी किसी ने सोचा था और न ही कल्पना की थी।



एंबेसडर से घुसे 5 आतंकवादी

संसद के स्थगित होने के बाद जब सांसद बाहर आए, तो मीडिया के कैमरे उनके पीछे भागे। पत्रकारों और कैमरों ने सांसदों को घेर लिया और उनसे महिला आरक्षण बिल पर चर्चा करने लगे। थोड़ी ही देर में सफेद एंबेसडर, जो आमतौर पर सांसदों की गाड़ी रहती थी, उसमें सवार होकर 5 आतंकी संसद में तेजी से घुस आए। बताया जाता है कि करीब साढ़े ग्यारह बजे उपराष्ट्रपति के सिक्योरिटी गार्ड उनके बाहर आने का इंतजार कर रहे थे और तभी सफेद एंबेसडर में सवार 5 आतंकी गेट नंबर-12 से संसद के अंदर घुस गए। उस समय सिक्योरिटी गार्ड निहत्थे हुआ करते थे। ये सब देखकर सिक्योरिटी गार्ड ने उस एंबेसडर कार के पीछे दौड़ लगा दी।



और फिर शुरू हुई फायरिंग

आतंकियों की कार तेजी से संसद के अंदर घुसी। उसकी स्पीड ज्यादा थी, तो वहां मौजूद सिक्योरिटी गार्ड ने उसका पीछा करना शुरू किया। तभी आनन-फानन में आतंकियों की कार उपराष्ट्रपति की कार से टकरा गई। बस फिर क्या था, घबराकर आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। ऐसा लगा, मानो जैसे कोई पटाखे फोड़ रहा हो। ये सब देखकर संसद के अंदर और बाहर दोनों तरफ अफरा-तफरी मच गई। संसद परिसर में मौजूद लोग समझ नहीं पा रहे थे कि हुआ क्या है और अंदर जो लोग मौजूद थे, उन्हें समझना था कि आखिर माजरा क्या है। आतंकियों के पास एके-47 और हैंडग्रेनेड थे, जबकि सिक्योरिटी गार्ड निहत्थे थे।



फिर शुरू हुआ आतंकियों के मरने का सिलसिला

संसद भवन में अक्सर सीआरपीएफ की एक बटालियन मौजूद रहती है। गोलियों की आवाज सुनकर ये बटालियन अलर्ट हो गई। सीआरपीएफ के जवान दौड़-भागकर आए। उस वक्त सदन में देश के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, प्रमोद महाजन समेत कई बड़े नेता और पत्रकार मौजूद थे। सभी को संसद के अंदर ही सुरक्षित रहने को कहा गया। इसके बाद आतंकवादियों और सिक्योरिटी फोर्सेस के बीच लड़ाई शुरू हुई। इस बीच एक आतंकी ने गेट नंबर-1 से सदन में घुसने की कोशिश की, लेकिन सिक्योरिटी फोर्सेस ने उसे वहीं मार गिराया। इसके बाद उसके शरीर पर लगे बॉम्ब में भी ब्लास्ट हो गया। जैसे ही पहला आतंकी मारा गया, तो एक दूसरे आतंकी ने आकर हमला करना शुरू कर दिया।



4 बजे खत्म हुआ ऑपरेशन

इसके बाद बचे हुए बाकी के 4 आतंकियों ने गेट नंबर-4 से सदन में घुसने की कोशिश की, लेकिन इनमें से 3 आतंकियों को वहीं पर मार दिया गया। इसके बाद बचे हुए आखिरी आतंकी ने गेट नंबर-5 की तरफ दौड़ लगाई, लेकिन वो भी जवानों की गोली का शिकार हो गया। सिक्योरिटी फोर्सेस और आतंकियों के बीच 11:30 बजे से शुरू हुई ये मुठभेड़ शाम को 4 बजे जाकर खत्म हुई। इस पूरे हमले में दिल्ली पुलिस के 5 जवान, सीआरपीएफ की एक महिला सिक्योरिटी, राज्यसभा के 2 कर्मचारी और एक माली की मौत हो गई। पांचों आतंकियों को मार गिराने के बाद सिक्योरिटी फोर्सेस संसद भवन के अंदर पहुंची और छानबीन शुरू की। 



4 लोगों को किया गया गिरफ्तार

संसद पर हमला, कोई छोटा हमला नहीं था। इस हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। लोकतंत्र के मंदिर पर हुए हमले के मामले में 4 और लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में 16 दिसंबर 2002 को इन सभी लोगों को दिल्ली की पोटा कोर्ट ने दोषी करार दिया। इन आतंकियों के नाम थे- मोहम्मद अफजल (अफजल गुरू), शौकत हुसैन, अफसान और प्रोफेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रहमान गिलानी और अफसान को बरी कर दिया, लेकिन अफजल गुरू की मौत की सजा को बरकरार रखा। शौकत हुसैन की मौत की सजा को भी घटा दिया और 10 साल की सजा का फैसला सुनाया। अफजल को पहले 20 अक्टूबर 2006 को फांसी पर लटकाना था, लेकिन उसकी पत्नी तबस्सुम ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। काफी वक्त के लिए अफजल की फांसी अटक गई। आखिरकार तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उसकी पत्नी की दया याचिका को खारिज कर दिया और 8 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सुबह 8 बजे फांसी पर लटका दिया गया। 

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