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किसानों पर यूं ही जुल्म होते रहे तो भूखा मर जाएगा देश

July 27th, 2017 15:53 IST
किसानों पर यूं ही जुल्म होते रहे तो भूखा मर जाएगा देश

टीम डिजिटल, भोपाल. 'मंदसौर से निकला किसान आंदोलन अब व्यापक हो चला है. इसकी आग देश के 9 राज्यों तक फैल चुकी है. देशभर के 62 किसान संगठन अब लामबंद हो चुके हैं. किसानों की घटती कृषि भूमि, बढ़ती लागत और घटता उत्पादन मूल्य सरकारों की कुछ ऐसी दमनकारी नीतियां हैं जिनकी बदौलत आगे आने सालों में हम अन्न के एक-एक दाने के लिए मोहताज हो सकते हैं.' यह कहना है 'राष्ट्रीय किसान महासंघ' के राष्ट्रीय संयोजक शिवकुमार शर्मा उर्फ 'कक्का जी' का. उन्होंने bhaskarhindi.com से एक एक्सक्लूजिव इंटरव्यू में किसानों से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात की . प्रस्तुत हैं चर्चा के कुछ अंश:-

किसानों की मौजूदा दशा के लिए कौन जिम्मेदार है ?
देखिए इसके लिये हमको पीछे जाना पड़ेगा. परमाणु परीक्षण के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी की एनडीए सरकार पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भारी दबाव था. उस वक्त तेल के आयात सहित दूसरी जरूरी चीजों के लिए हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर केवल 3 दिन के लिए ही बचा था. ऐसे में अमेरिका के दबाव में आकर सालाना कृषि की भागीदारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 53 फीसदी से घटाकर 3 फीसदी करने का करार हुआ था. बाजपेयी जी ने जहर की पुड़िया में वर्क लगाकर "शाइनिंग इंडिया और विजन इंडिया" का नारा दिया और अपनी दमनकारी नीतियों से कृषि की भारतीय अर्थव्यवस्था में भागीदारी आज घटकर 13 फीसदी रह गई है. बाकी सरकारों ने भी उस करार को जारी रखा और उसका परिणाम आज आपके सामने है.

कृषि भागीदारी जीडीपी से घटाने का काम कैसे किया गया ?
इसका सबसे आसान तरीका है किसानों की लागत बढ़ा दो और उन्हें उत्पादन का उचित मूल्य न दो किसान खुद-ब-खुद खेती छोड़ देगा. लगातार 2 फीसदी की सालाना दर से हमारी उपजाऊ भूमि इंडस्ट्रीयल विकास की भेंट चढ़ रही है. यदि यही चलता रहा, तो आगे आने वाले सालों में बढ़ती आबादी के हिसाब से 200 करोड़ लोगों को खाना खिलाने वाली जमीन ही हमारे पास नहीं बचेगी. 

किसानों को इस दुर्दशा से उबारने के लिए कोई 3 उपाय बताएं ?
इसके लिए केवल 2 ही उपाय में काम हो जाएगा और वही हमारा नारा है -किसानों की खुशहाली के दो आयाम 'ऋणमुक्ति और पूरा दाम'. मोदी सरकार के आने के बाद से गेहूं और धान का 100 रुपए बोनस विड्रॉ कर दिया. इसके ठीक छह माह के अंदर 2 लाख 50 हजार करोड़ का देश के उद्योगपतियों का कर्जा भी माफ किया गया. और किसानों को 18 फीसदी ब्याज के साथ ऋण मिलता है. मोदी सरकार में अब तक 18 बार कपास निर्यात पर रोक लगी है. केवल मध्यप्रदेश के किसानों का कर्जा 45 हजार करोड़ रुपए के करीब है. यह सब सरकार की कृषि विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम है. इसलिए हमको 'कर्जमाफी' नहीं 'कर्जमुक्ति' चाहिए. माफी शब्द से हमें नफरत है.

सरकारी योजनाओं और घोषणाओं का क्या कुछ हासिल नहीं है ?
देखिए सरकार की घोषणाएं जमीन पर अमल कहां होती हैं ? किसान आधुनिक खेती कर भी ले तो क्या फायदा ? उसके उत्पादों के लिए बाजार कहा है ? मोदी सरकार के चुनावी मेनीफेस्टो में दो वादे थे. केवल वही पूरे हो जाएं तो हालात बदल जाएंगे. एक तो किसानों को उपज लागत के ऊपर 50 फीसदी मूल्य मिलना और दूसरा फसल बेचने की गारंटी. यदि यही दो शर्तें पूरी हो जाएं तो किसान खुशहाल हो जाएगा, लेकिन इसके लिए सबसे पहले किसान को कर्जमुक्त होना होगा. आज 18 फीसदी से ज्यादा ब्याज पर किसानों को संसाधन मुहैया होते हैं. जबकि बाकी लोन 12 फीसदी से ज्यादा नहीं हैं.

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