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यहां 4 माह तक विधवाओं का जीवन जीतीं हैं महिलाएं, जानें क्या है परंपरा

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 18th, 2017 20:49 IST

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डिजिटल डेस्क, गोरखपुर। भारत देश अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। आज आपको गछवाहा समुदाय की एक ऐसी ही परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं। यहां पति की सलामती के लिए महिला विधवाओं का जीवन जीती हैं। यह समुदाय पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर देवरिया और इससे सटे बिहार के कुछ इलाकों में निवास करता है। ये लोग मुख्या रुप से ताड़ी का व्यवसाय करते हैं।

चैत से सावन तक मांग में सिंदूर भरती महिलाएं

गछवाह महिलाएं जिन्हें तरकुलारिष्ट भी कहा जाता है। चैत से सावन तक चार माह ना ही मांग में सिंदूर भरती है और ना ही कोई श्रंगार करती हैं ये विधवाओं की तरह जीवन इन चार माह में जीती हैं। इसे लेकर कहा जाता है कि ताड़ी निकालने का कार्य अत्यंत कठिन है 50 फीट से ज्यादा ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर ये लोग ताड़ी निकालते हैं। ऐसे में पति की सलामती के लिए ये महिलाएं अपनी सुहाग की सामग्री तरकुलहा देवी के पास रेहन रख देती हैं और पति के लिए प्रार्थना करती हैं। 

नागपंचमी पर मंदिर में एकत्रित होते हैं 

तरकुलहा देवी इनकी इष्ट देवी हैं जो इनकी हर संकट में रक्षा करती हैं। ताड़ी का काम खत्म होते ही नागपंचमी पर समुदाय के सभी लोग मंदिर में एकत्रित होते हैं और महिलाएं देवी की विधि-विधान से पूजा अर्चना करने के बाद अपनी मांग भरती हैं और फिर से पूरा श्रंगार धारण करती हैं। ये लोग गोठ का भी आयोजन करते हैं जिसमें पशु बलि का विधान है। 

कब से चली आ रही है यह परम्परा 

विवाह के बाद हिंदू धर्म में सुहाग की निशानी छाेड़ना अशुभ माना गया है जबकि इनके यहां एेसा नही है। इस समुदाय में सुहाग चिन्ह को छोड़ना अति शुभ एवं पति की लंबी आयु के लिए उत्तम माना जाता है। गछवाहों में यह परम्परा कब से चली आ रही है इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। 

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