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आशीष देशमुख का इस्तीफा स्वीकार, भाजपा में हैं कई असंतुष्ट नेता

BhaskarHindi.com | Last Modified - October 08th, 2018 19:41 IST

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आशीष देशमुख का इस्तीफा स्वीकार, भाजपा में हैं कई असंतुष्ट नेता

डिजिटल डेस्क, नागपुर। काटाेल से विधायक आशीष देशमुख का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। भाजपा के नाराज चल रहे विधायक आशीष देशमुख के इस्तीफे से नागपुर की काटोल विधानसभा की सीट रिक्त हो गई है। विधानसभा अध्यक्ष हरिभाऊ बागडे ने देशमुख का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। इसके साथ ही काटोल सीट रिक्त होने के संबंध में विधानमंडल की तरफ से 6 अक्टूबर को अधिसूचना जारी कर दी गई है। काटोल विधानसभा सीट रिक्त होने के बारे में विधानमंडल ने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर सूचित किया है। काटोल की सीट रिक्त होने के कारण इस सीट पर उपचुनाव होना तय है। क्योंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने में अभी साल का समय है। देशमुख कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं। उन्होंने साफ किया है कि वे विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए इच्छुक नहीं है। आघाड़ी सरकार के समय इस सीट पर कांग्रेस की सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता व पूर्व मंत्री अनिल देशमुख चुनाव लड़ते आए हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में आशीष देशमुख ने इस सीटे से अपने चाचा अनिल देशमुख को पराजित किया था।

फिलहाल आशीष का कांग्रेस प्रवेश भी लंबित है। कहा जा रहा है कि पार्टी छोड़ने पर आशीष जैसी स्थिति न होने की आशंका के कारण ही कुछ विधायक मौन साधे हुए हैं, अन्यथा वे भीतरी तौर पर अपनी कसमसाहट व्यक्त कर चुके हैं। अकेले बल पर राज्य में सत्ता में लौटने के प्रयास में जुटी भाजपा को अपने ही असंतुष्ट विधायकों को संभालने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। काटाेल से विधायक पद का इस्तीफा दे चुके आशीष देशमुख लंबे समय से खुले तौर पर पार्टी व पार्टी नेताअों के विरोध में बोलने लगे थे, लेकिन पार्टी की ओर से उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। 

क्षेत्र के सवाल तक नहीं उठाने दिए जाते हैं
नागपुर में कानून व्यवस्था व बिजली आपूर्ति के मामले में विधायक सुधाकर कोहले व कृष्णा खोपड़े आवाज उठाते रहे हैं। एसएनडीएल के विरोध में प्रदर्शन को भाजपा विधायकों का समर्थन मिलता रहा है, जबकि ऊर्जा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले कई मामलों पर पार्टी विधायकों को लेकर असंतोष जताते रहे हैं। विधायकों के असंतोष पर कृष्णा खोपड़े ने तो एक बार खुलकर प्रदेश भाजपा को खरी-खरी सुनाई थी। नागपुर के ही शिक्षक सहकारी बैंक सभागृह में कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष रावसाहब दानवे से कहा था कि कुछ मंत्री पार्टी के विधायकों को भी नजरअंदाज करने लगे हैं। विधायकों की कोई बात सुनना तो दूर, उन्हें अनदेखा कर आगे निकल जाते हैं। शहर के ही विधायक विकास कुंभारे कह चुके हैं कि हलबा समाज के आरक्षण के संरक्षण को लेकर वे इस्तीफा देने को तैयार हैं। 

इनकी अपनी-अपनी नाराजगी
अकोला के सांसद संजय धाेत्रे के भांजे रणधीर सावरकर गृह राज्यमंत्री रणजीत पाटील को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। सावरकर अकोला के विधायक हैं। वे गन लाइसेंस से लेकर जमीन आबंटन मामले में मंत्री पाटील पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके हैं। भंडारा जिले के तुमसर से विधायक चरण वाघमारे निर्माण कार्य विभाग को लेकर कभी खुश नहीं रहे हैं। सावर्जनिक निर्माण कार्य विभाग के मंत्री चंद्रकांत पाटील राज्य में दूसरे क्रमांक के मंत्री माने जाते हैं। विधायक वाघमारे शांत स्वभाव के माने जाते हैं, पर पाटील के मामले में आक्रामक हो जाते हैं। उनका कहना है कि केवल बड़े शहर की सड़कें सुधारना ही काफी नहीं होगा।

तुमसर जैसे क्षेत्रों की स्थिति देखना होगा, जहां नगरपरिषदों के पास अधिकार तो हैं, पर काम नहीं। सार्वजनिक निर्माण कार्य विभाग के विराेध में वाघमारे, मुख्यमंत्री को पत्र भेजते रहते हैं। मराठवाड़ा के भाजपा विधायक प्रशांत बंब अधिकारियों के विरोध में रहकर सरकार पर उंगली उठाने से नहीं चूकते हैं। हालांकि बंब पर ही यह भी अारोप लगा है कि वे अधिकारियों को ब्लैकमेल करने लगते हैं। निर्माण कार्य विभाग के सचिव सी. पी. जोशी के विरोध में बंब भाजपा के लिए बागी की मुद्रा में आ जाते हैं। मलकापूर के विधायक चैनसुख संचेती को विदर्भ विकास वैधानिक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया है। लेकिन वे मंत्रिमंडल में स्थान पाना चाहते है, इसलिए रूठे हैं। 

असंतुष्टों पर दबाव
प्रदेश स्तर पर भाजपा ने कुछ असंतुष्टों पर दबाव लाने के लिए चौंकानेवाले निर्णय लिए हैं। महामंडलों के अध्यक्षों की नियुक्ति के समय शिवसेना व राकांपा के विधायक को मौका देकर अपने दल के असंतुष्टों को विधानसभा चुनाव में संभावित उम्मीदवारी को लेकर नया संकेत दिया है। लिहाजा असंतुष्ट मौन साधे हुए हैं। भाजपा के 5-6 असंतुष्ट विधायकों में सबसे पहले एकनाथ खडसे व आशीष देशमुख का नाम गिनाया जाता रहा है। मंत्री पद खोने के बाद खडसे भाजपा में बागी नेता बने हुए हैं। भाजपा उन्हें न तो मंत्री बना रही है न ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा पा रही है। भाजपा विधायकों की यह भी शिकायत रहती है कि उन्हें विधानसभा या विधान परिषद में अपने निर्वाचन क्षेत्र के सवाल तक नहीं उठाने दिए जाते हैं। पहले देखा जाता है कि कहीं पार्टी को नुकसान तो नहीं होगा। सवाल नहीं उठाने देने की शिकायत नागपुर जिले से भी मिलती रही है। 
 

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