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VIDEO : प्लेट में डालते ही मदिरा पीने लगे काल भैरव, दिखा अद्भुत रूप

BhaskarHindi.com | Last Modified - August 29th, 2018 18:26 IST

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डिजिटल डेस्क, उज्जैन। काल भैरव कब अपना चमत्कार दिखाने लगें ये कहा नहीं जा सकता। ये मदिरापान करते हैं। लेकिन हर वक्त नही उन भक्ताें काे साैभाग्यशाली माना जाता है। जो उन्हें मदिरापान करते हुए देखते हैं। आज हम आपको यहां एक वीडियाें के जरिए एेसा ही दृश्य दिखाने जा रहे हैं जो शायद वहां जाने के बाद भी आपकाे देखना नसीब हुअा हाेगा।  इस वीडियाे में कालभैरव साक्षात मदिरापान करते नजर आ रहे हैं। हालांकि आज तक किसी के लिए इसका पता लगाना संभव नही हुआ कि आखिर ये जाती कहां है। 

यहां प्रवेश करते ही भव्य ऊंची इमारत आपको दिखाई देगी। राजा महाराजाओं के ठाठ और राॅयल अंदाज। विशाल प्रवेश द्वार जहां मानों कभी बडे़-बड़े सैनिक प्रवेश की अनुमति देने और रोकने के लिए खडे़ हुआ करते थे। आज हम बात कर रहे हैं उज्जैन में स्थित काल भैरव मंदिर की। जहां उज्जैन नगर और शिव के सेनापति कहे जाने वाले काल भैरव साक्षात विराजमान हैं और जब-तब मदिरा अर्थात शराब का सेवन करते हैं। मंदिर के आसपास लगी दुकानों में इन्हें प्रसाद के रुप में चढ़ाने के लिए शराब उपलब्ध करायी जाती है। 

वाम मार्गी मंदिर
वाम मार्गी यह मंदिर तांत्रिक है और मध्यप्रदेश के उज्जैन से करीब 8 किमी की दूरी पर स्थित है। क्षिप्रा नदी के तट पर कालभैरव मंदिर को लेकर अनेक मान्यताएं हैं। इन्हें ही काशी का कोतवाल भी कहा जाता है जबकि उज्जैन में शिव का सेनापति। इनका मंदिर नगर के बाहर होने का कारण भी नगर की रक्षा करना है। वाम मार्गी मंदिर अर्थात जहां मदिरा, मांस, बलि आदि प्रसाद के रुप में चढ़ाए जाते हैं। 

6 हजार साल पुराना मंदिर

यह मंदिर 6 हजार साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। पहले यहां पशुओं की बलि प्रथा थी, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है। कहा जाता है कि यहां पहले सिर्फ तांत्रिकों को ही आने की अनुमति थी, किंतु अब सभी यहां कालभैरव के दर्शन कर सकते हैं। 

प्रचलित है ये कथा

कालभैरव को लेकर एक कथा भी प्रचलित है। जिसके अनुसार ब्रम्हदेव चार वेदों की रचना के बाद पांचवे वेद की रचना करने वाले थे, तभी उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए देवता शिव की शरण में गए और उनसे प्रार्थना की। शिव ने कालभैरव के रूप का अवतरण किया। उनके मना करने के बाद भी ब्रम्हदेव नहीं माने तब कालभैरव ने गुस्से में आकर उनका पांचवा सिर धड़ से अलग कर दिया। किंतु इस पाप से बचने के लिए वे तीनों लोकों में घूमे फिर भी उन्हें कहीं इससे छुटकारा नही मिला। फिर वे शिव की शरण में गए। भगवान शिव ने उन्हें क्षिप्रा के तट पर ओखर श्मशान के पास जाकर तप करने के लिए कहा। जहां उन्हें इस पाप से छुटकारा मिलेगा। कहा जाता है कि तब ये वे यहीं विराजमान हैं।

अंग्रेज बना भक्त

यह भी बताया जाता है कि एक बार एक अंग्रेज अधिकारी ने यह पता करने के लिए कि शराब कहां जाती है। मूर्ति के चारों ओर खुदावा डाला लेकिन उसे कुछ पता नही चल सका। जिसके बाद वह भी काल भैरव का भक्त बन गया। 

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