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इलाहाबाद HC के जज को हटाने के लिए CJI ने राष्ट्रपति को लिखा था लेटर, RTI में खुलासा

BhaskarHindi.com | Last Modified - March 13th, 2018 15:05 IST

इलाहाबाद HC के जज को हटाने के लिए CJI ने राष्ट्रपति को लिखा था लेटर, RTI में खुलासा

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मेडिकल एडमिशन स्कैम में नाम सामने आने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसएन शुक्ला को हटाने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा ने राष्ट्रपति सचिवालय को लेटर लिखा था। RTI एक्टिविस्ट पारस नाथ सिंह की तरफ से फाइल की गई RTI में ये जानकारी निकलकर सामने आई है। राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से इस RTI पर जवाब देते हुए बताया गया है कि CJI दीपक मिश्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज को हटाने के लिए 2 फरवरी 2018 को लेटर लिखा था। बता दें कि इस मामले में CJI दीपक मिश्रा ने जस्टिस शुक्ला को इस्तीफा देने या इच्छा से रिटायरमेंट लेने की बात भी कही थी, लेकिन जस्टिस शुक्ला ने इससे इनकार कर दिया था।

RTI में क्या मांगी गई थी जानकारी?

RTI एक्टिविस्ट पारस नाथ सिंह ने अपनी RTI में 6 जानकारी मांगी थी।

1. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस नारायण शुक्ला के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू करने के लिए राष्ट्रपति सचिवालय को किस तारीख को लेटर लिखा था?

2. चीफ जस्टिस ने जो लेटर भेजा था, उसकी सर्टिफाइड कॉपी दी जाए। 

3. इस मामले में राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से क्या कार्रवाई की गई?

4. राष्ट्रपति ने CJI के लेटर पर क्या कहा, उसकी सर्टिफाइड कॉपी दी जाए।

5. राष्ट्रपति सचिवालय की वो सर्टिफाइड कॉपी, जिसे केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय और प्रधानमंत्री ऑफिस को भेजा गया था।

6. अब तक CJI की सिफारिश पर राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से क्या कार्रवाई की गई, उसकी पूरी जानकारी दी जाए।

 



राष्ट्रपति सचिवालय ने क्या जानकारी दी?

पारस नाथ सिंह की RTI पर राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से ज्यादा जानकारी तो नहीं दी गई है, लेकिन बताया गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज को हटाने के लिए CJI ने राष्ट्रपति सचिवालय को लेटर लिखा था। राष्ट्रपति सचिवालय ने बताया है कि 'CJI दीपक मिश्रा ने 2 फरवरी 2018 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस नारायण शुक्ला के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की थी।' हालांकि बाकी के सवालों पर राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से कोई जानकारी नहीं दी गई है।

जस्टिस शुक्ला पर क्या हैं आरोप? 

जानकारी के मुताबिक, जस्टिस शुक्ला पर आरोप है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक बेंच की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने एकेडमिक ईयर 2017-18 में मेडिकल स्टूडेंट्स को एडमिशन देने के लिए प्राइवेट कॉलेजों को परमिशन दे दी थी। जस्टिस शुक्ला का ये फैसला चीफ जस्टिस के फैसले के खिलाफ था। इस पूरे मामले को लेकर जस्टिस शुक्ला के खिलाफ पिछले साल 1 सितंबर को चीफ जस्टिस को दो शिकायतें दी गई थीं।

3 जजों के पैनल ने की थी जांच

इस मामले की शिकायत के बाद जांच के लिए 3 जजों की एक इन-हाउस पैनल बनाई गई थी। इस पैनल में मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस इंदिरा बनर्जी, सिक्कीम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीके जायसवाल थे। इस पैनल ने अपनी सिफारिश में कहा था कि 'जस्टिस शुक्ला ने ज्यूडिशियल वैल्यूज़ को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने एक जज का रोल ठीक से नहीं निभाया और अपने ऑफिस की गरिमा और विश्वसनीयता को ठेस पहुंचाने वाला काम किया है।'

क्या है मेडिकल एडमिशन घोटाला? 

दरअसल, देशभर के 46 मेडिकल कॉलेजों में नए एडमिशन को लेकर केंद्र सरकार ने रोक लगा दी थी। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। CBI के मुताबिक, पूर्व जजों ने अपने कॉन्टेक्ट्स के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में केस को रफा-दफा करने को कहा और इसके एवज में पैसों की डिमांड भी की गई थी। CBI जांच में ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज इशरत मसरूर कुद्दुदसी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो मौजूदा जजों का नाम सामने आया। इस मामले में पूर्व जज आईएम कुद्दुदसी समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और फिलहाल ये सभी जेल में बंद हैं। अब अगर CJI दीपक मिश्रा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शुक्ला को पद से हटा देते हैं, तो CBI जस्टिस शुक्ला के खिलाफ केस दर्ज कर सकती है और उन्हें गिरफ्तार भी कर सकती है। 

क्या होता है महाभियोग ? 

भारत के संविधान के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट या किसी हाईकोर्ट के जज को सिर्फ 'महाभियोग' के जरिए ही हटाया जा सकता है। महाभियोग को 'इंपीचमेंट' कहा जाता है, जिसका लैटिन भाषा में मतलब होता है 'पकड़े जाना'। भारतीय संविधान में महाभियोग का उल्लेख आर्टिकल 124(4) में मिलता है। इसके तहत अगर किसी भी कोर्ट के जज पर कोई आरोप लगता है, तो उसे महाभियोग लाकर पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग के जरिए किसी जज को पद से हटाने के लिए लोकसभा के 100 सांसद और राज्यसभा के 50 सांसदों की सहमति जरूरी होती है। इसके साथ ही महाभियोग के जरिए किसी जज को तभी पद से हटाया जा सकता है, जब ये प्रस्ताव संसद को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास होता है। 

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