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देवी लक्ष्मी नहीं दिवाली की अमावस्या पर यहां होती है काली पूजा, जानें महत्व

October 18th, 2017 11:44 IST
देवी लक्ष्मी नहीं दिवाली की अमावस्या पर यहां होती है काली पूजा, जानें महत्व

डिजिटल डेस्क, कोलकाता। एक ओर दिवाली की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। एक दिन पहले व खास दिवाली पर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और बांग्लादेश में काली पूजा की परंपरा है। दिवाली की रात खास कार्तिक माह की अमावस्या को यह पूजा की जाती है। इसे श्यामा पूजा या महानिषि पूजा के नाम से भी जाना जाता है। भारत के अधिकांश हिस्सों में दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का महत्व है लेकिन पश्चिम बंगाल सहित ओडिशा, असम में काली पूजा से दिवाली सजी होती है। 

अत्यंत ही काली रात 

कोलकाता में स्थित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर विश्वप्रसिद्ध है। यहां अमावस्या तिथि पर पूजन का दृश्य बेहद अलौकिक होता है। स्थनीय लोगों की मान्यता है कि अमावस्या तिथि पर मां काली की पूजा करने से डर या भय खत्म होता है। रोगों से मुक्ति मिती है एवं शत्रु का नाश होता है। अमावस्या की रात अत्यंत ही काली और तांत्रिक, बुरी शक्तियों को जाग्रत करने वाली भी बताई गई है। जिनका नाश सिर्फ काली पूजा ही कर सकती है। 

राहु-केतु की शांति के लिए

वहीं राहु और केतु की शांति के लिए मां काली की उपासना अचूक है, किंतु विशेषज्ञों के मार्गदर्शन के बगैर इस तरह का पूजन उर्पयुक्त नही है। थोड़ी-सी भी चूक बड़ी विपत्ति के रूप में सामने आ सकती है। मां काली की पूजा में लाल और काली वस्तुओं का विशेष महत्व है। इन्हें पूजन में मिठाई, चावल व फूलों के अतिरिक्त मछली भी अर्पित की जाती है। 

14 प्रकार की साग 

एक दिन पहले नरक चतुर्दशी को जिसे यहां भूत चतुर्दशी भी कहा जाता है, मां काली की मूर्ति लाई जाती है। इनका स्वागत किया जाता है। इसके बाद घर में 14 दीपक जलाए जाते हैं। इस अवसर पर 14 प्रकार की साग, हरी सब्जियां जो कि पत्तों से बनी होती है, घर में बनाई जाती है। खिचड़ी, लूची और लबरा भी पूजन के लिए बनाया और प्रसाद में बांटा जाता है। 

काली पूजन मुहूर्त 

11:31 दोपहर से 12:21 दोपहर तक

अमावस्या तिथि शुरू: 00:13  19/Oct/2017

अमावस्या तिथि समाप्त: 00:41   20/Oct/2017

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