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ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, सभी कष्टों से मिलेगी मुक्ति


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र पर्व के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को मां के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएं हाथ में कमण्डल रहता है। नवरात्रि के नौ दिन आदिशक्ति के भिन्न-भिन्न नौ रूपों को समर्पित होते हैं। 

नवरात्रि के पहले दिन जैसे शैलपुत्री की पूजा होती है तो वहीं दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। ब्रह्म शब्द का भावार्थ है तपस्या और चारिणी शब्द का भावार्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का भावर्थ होता है तपस्वी जैसा आचरण करने वाली। मां दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

माता ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए देवी ने कठिन तपस्या की थी। कई हजार साल तक इन्होंने केवल कंद-मूल खाकर बिताए। अनेक दिनों तक कठिन व्रत रखे और वर्षा और धूप सही। इसके बाद कई वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। एक समय ऐसा भी आया जब इन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया जिसके कारण इनका नाम अपर्णा पड़ा।

मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जो लोग पूरी श्रद्धा भाव के साथ देवी की भक्ति करते हैं उनके अंदर तप, त्याग,वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। बताया जाता है कि देवी का ये स्वरूप अनंत फल देने वाला है। 

मां ब्रह्मच्रारिणी की पूजा का क्या है महत्व
मान्यता है कि माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। जिससे भक्तों का जीवन सफल हो जाता है और किसी भी बाधा का सामना करने के लिए उनमें शक्ति आ जाती है। ज्ञान और वैराग्य देने वाली मां ब्रह्मचारिणी कठिन समय में भक्तों की रक्षा करती है। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर मां ब्रह्मचारिणी इस मंत्र के द्वारा प्रार्थना करें।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें। देवी को अरूहूल का फूल व कमल बेहद प्रिय होते हैं। अत: इन फूलों की माला पहनायें, घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।

“मां ब्रह्मचारिणी का स्रोत पाठ”

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

“मां ब्रह्मचारिणी का कवच”

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी। अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी। षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा विधि
मां ब्रह्मचारिणी जी की पूजा में सर्वप्रथम माता की फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें तथा उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को प्रसाद अर्पित करें। प्रसाद के बाद आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें।

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