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जया एकादशी पर ऐसे करें पूजा, मिलती है हर तरह के पापों से मुक्ति

BhaskarHindi.com | Last Modified - February 06th, 2019 15:07 IST

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जया एकादशी पर ऐसे करें पूजा, मिलती है हर तरह के पापों से मुक्ति

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही शुभ माना जाता है। वहीं माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है। माघ शुक्ल एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है, इसे अजा तथा भीष्म एकादशी भी कहते हैं। जो इस माह 15 फरवरी 2019 को मनाई जा रही है। मान्यता है कि इस एकादशी के उपवास से व्यक्ति को हर तरह के पापों से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष को पा लेते हैं। जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। आइए जानते हैं जया एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

व्रत विधि-विधान
जया एकादशी के विषय में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से निवेदन कर जया एकादशी का महात्म्य, कथा तथा व्रत विधि के बारे में पूछा था। तब श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जया एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत विधि-विधान से करने से तथा ब्राह्मण को भोजन कराने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है।

ऐसे करें व्रत की शुरुआत
भीष्म एकादशी के दिन प्रात: टूथपेस्ट ना करें नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उंगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर उपयोग करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। 

ना करें ये काम
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इस मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम का पाठ करें। भीष्म एकादशी पर घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। न नही अधिक बोलना चाहिए। 

क्या सेवन करें क्या नहीं
इस दिन यथाशक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि ग्रहण न करें। इस दिन व्रतधारी को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रत के दौरान केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का ही सेवन करना चाहिए। 

दिव्य फल की प्राप्ति
प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ही ग्रहण करना चाहिए। अगले दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए। क्रोध नहीं करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है और उसके जीवन के सारे कष्ट धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।

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