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क्या आप जानते हैं बेटी भी कर सकती है श्राद्ध कर्म या पितृ का तर्पण

October 02nd, 2018 22:47 IST

डिजिटल डेस्क, भोपाल। पितृ पक्ष के समय पितरों का तर्पण किया जाता है। घर का बेटा श्राद्ध कर्म की विधि और तर्पण करता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यदि घर में बेटा ना हो तो घर की बेटियां भी श्राद्ध कर्म कर सकती हैं। कुंवारी बेटी या दत्तक पुत्री उस दशा में ये कर्म कर सकती है जबकि उसने आजीवन विवाह ना करने का निश्चय किया हो। बेटी जब विवाहित है तो पति की आज्ञा लेकर पति पत्नी दोनों यह कार्य कर सकते हैं।

तर्पण के अधिकारी वंशज या बड़े दामाद को ही स्वीकार किया जाता है। बेटी उस दशा में भी श्राद्ध कर्म कर सकती है, यदि बेटा अशक्त और असमर्थ है। यदि कोई बेटा ना हो तो इस दशा में बेटी द्वारा तर्पण या श्राद्ध किया जा सकता है। वैसे तो बेटियों को तर्पण और श्राद्ध की अनुमति नहीं है किन्तु कुछ दशाओं में यह किया जा सकता है।

श्राद्ध कर्म करते समय जो श्राद्ध का भोजन कराया जाता है। उसके लिए उत्तम समय 11:36 बजे से 12:24 बजे तक होता है। गया, पुष्कर, प्रयाग और हरिद्वार में श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है। इन सब बातों के बाद भी आप अपने स्थानीय प्रचलित नियमों का पालन अवश्य करें,क्योंकि सर्वप्रथम लोकाचार या सामाजिक नियम ही मान्य कहे जाते हैं।

गौशाला में, देवालय में और नदी तट पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है। सोना, चांदी, तांबा और कांसे के बर्तन में अथवा पलाश के पत्तल में भोजन करना-कराना अति उत्तम माना गया है। लोहा, मिट्टी आदि के बर्तन काम में नहीं लाने चाहिए। श्राद्ध के समय मन को सामान्य रखना, हड़बड़ या जल्दबाजी नहीं करना चाहिए।

आपको बतादें की अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्दशी,अष्टमी, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री- सहवास एवं तिल का तेल खाना व लगाना निषिद्ध है। श्राद्ध कर्म में सफ़ेद सुगन्धित फूल उपयोग में लाने चाहिए। लाल, काले पुष्प का त्याग करना चाहिए। अति सुगंध वाले पुष्प या सुगंधहीन फूल श्राद्ध कर्म में उपयोग नहीं लिए जाते हैं। आज के व्यस्त जीवन में यदि कोई विस्तृत श्राद्ध पूजा न कर पाए तो उसे प्रतिदिन पीपल के वृक्ष में पितृ देवों के निमित्त जल चढ़ाना चाहिए। पीपल में जल चढ़ाते समय निम्न मंत्र का पाठ करते हुए 3 लोटा जल चढ़ाना चाहिए -

ॐ नमः आब्रम्ह भुवनाल्लोका देवर्षिपितृमानवा:। 
नमः आब्रम्ह भुवनाल्लोका देवर्षिपितृमानवा:। 
तृपन्तु पितर: सर्वे मातृमाता महादय:। 
आजन्म कुल कोटिनाम सप्तद्विपा निवासीनाम।  
मया दत्तेन तोयेन तृपन्तु भुवनत्रयम ॥

साथ ही घर में आसन पर आसीन होकर "ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः" मंत्र का जाप दोनों समय कम से कम 11 माला करना चाहिए। पितृ नाम जप भी पितरों को शांति एवं सद्गति प्रदान सकता है।

ॐॐ स्वधायै नमः। 
दत्त दत्तात्रेय नमः।।


सात शनिवार लगातार लोटे में जल कच्चा दूध एक चुटकी सिन्दूर एक बताशा और दूर्वा डालकर सूर्योदय के समय पीपल की जड़ में चढाएं। दीपक जलाकर सात परिक्रमा करें और बिना पीछे देखे वापिस घर आएं। तो पितृ स्वप्न में आकर अपनी इच्छा बताते हैं उस अनुरूप कार्य करने से पितृशांति होती है। पितृदोष की शांति के लिए तांबे के लोटे में जल श्वेत अर्क के फूल मिलाकर नित्य उगते सूर्य को अर्घ्य दें। उस समय सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें।

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