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ऐसी है प्रोफेसर के पद से प्रधानमंत्री तक पहुंचने वाले मनमोहन सिंह की कहानी...

BhaskarHindi.com | Last Modified - January 12th, 2019 08:03 IST

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ऐसी है प्रोफेसर के पद से प्रधानमंत्री तक पहुंचने वाले मनमोहन सिंह की कहानी...

News Highlights

  • मनमोहन की गिनती दुनिया के कुशल अर्थशास्त्रियों में होती है
  • फिल्म रिलीज के साथ ममोहन सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं
  • कम लेकिन सटीक बात कहने वाले शख्स हैं मनमोहन


डिजिटल डेस्क, भोपाल। दस साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने पहली बार 2004 में पीएम पद की शपथ ली थी। दूसरी बार उन्होंने 2009 में फिर देश का नेतृत्व किया था। कम लेकिन सटीक बात कहने वाले मनमोहन ने कई ऐसी नीतियां लागू कीं, जिन्हें अगली सरकार भी आज तक फॉलो कर रही है। मनमोहन 1982 से 1985 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर भी रह चुके हैं। शुरू से ही अर्थशास्त्र में रूचि होने के कारण मनमोहन की गिनती दुनिया के कुशल अर्थशास्त्रियों में होती है। उनके जीवन पर बनी फिल्म  Accidental Prime Minister को काफी प्रसिद्धि मिल गई है। बड़े पर्दे पर 11 जनवरी 2019 को फिल्म रिलीज हो गई है। फिल्म रिलीज के साथ ममोहन सिंह एक बार फिर चर्चा में है।


लेखक मुल्कराज आनंद ने कराई पं. नेहरू से मुलाकात
मनमोहन सिंह पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में व्याख्याता के पद पर नियुक्त हुए और जल्द ही प्रोफेसर के पद पर पहुंच गए थे। मनमोहन सिंह ने दो साल तक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी प्रोफेसर के रूप में काम किया। यहां पर लेखक मुल्कराज आनंद उनके पड़ोसी थे, जो एक दिन उनको जवाहर लाल नेहरू से मिलाने ले गए।

दर्जनों मुख्य पदों पर किया काम
मनमोहन सिंह 1971 में उस समय भारत सरकार में आए जब उन्हें वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया। इन्हें 1972 में वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया। डॉ. सिंह ने अनेक सरकारी पदों पर कार्य किया है, जिनमें वित्त मंत्रालय में सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधान मंत्री के सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के पद शामिल हैं।

रिस्क लेकर संभाली देश की अर्थव्यवस्था
जब मनमोहन ने देश के वित्तमंत्री की कुर्सी संभाली, तब देश में अविश्वास का माहौल था। मनमोहन को गद्दी संभालते वक्त पूरा अंदाजा था कि अगर उनके द्वारा किया गया सुधार सफल हो गया तो सरकार को जनता सर पर बैठा लेगी, लेकिन अगर वो सुधार नहीं ला पाए तो सारा ठीकरा उनके सर ही फूटेगा। मनमोहन की दूरदर्शिता और हिम्मत ने देश की अर्थव्यवस्था को वापस से पटरी पर ला दिया। साल 1991 से लेकर 1996 तक वो भारत के वित्त मंत्री रहे।

मनमोहन सिंह को मिले कई सम्मान
मनमोहन सिंह को भारत का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (1987) में मिल चुका है। उन्हें जवाहरलाल नेहरू बर्थ सेंटेनरी अवॉर्ड ऑफ द इंडियन साइंस कांग्रेस (1995),साल के सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवॉर्ड (1993 और 1994), साल के सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी अवॉर्ड (1993) मिला। अपने रुझान के मुताबिक उन्होंने पीएचडी करने का फैसला किया और वो इसके लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। यहां भी उन्हें पढ़ाई में कोई पछाड़ नहीं पाया और वो अव्वल आते रहे। उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए राइट्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नेफिल्ड कॉलेज से मनमोहन सिंह ने डी. फिल की परीक्षा उत्तीर्ण की।


पाकिस्तान में जन्मे थे मनमोहन
मनमोहन सिंह का जन्म 1932 में पंजाब प्रांत के गाह बेगल गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। देश विभाजन के बाद उनका परिवार भारत के अमृतसर में आकर बस गया।

देश बदला, फिर भी जारी रखी पढ़ाई
मनमोहन सिंह बचपन से ही पढ़ाई में रुचि रखते थे और हमेशा अपनी परिक्षाओं में अव्वल आते थे। यही वजह थी कि उन्होंने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी और घर, देश बदलने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.ए (ऑनर्स) की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद साल 1954 में यहीं से एम.ए (इकोनॉमिक्स) किया, जिसमें वो प्रथम आए।


कॉलेज कॉन्ट्रेक्ट के कारण नहीं लिया पद
नेहरू ने उनसे बात करते वक्त ये भांप लिया कि उनका आर्थशास्त्र में काफी रुझान है, जिसके बाद नेहरू ने मनमोहन को सरकार जॉइन करने के लिए कहा, लेकिन कॉलेज कॉन्ट्रैक्ट में बंधे मनमोहन ने नेहरू जी को इनकार कर दिया।


ये हैं बड़ी उपलब्धियां
आधार, मनरेगा, आरटीआई, JNNURM- पोलियो मुक्त भारत, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, किसान कर्ज माफी, अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, स्टॉक बाजार सुधार, विस्सल ब्लोअर, खाद्य सुरक्षा, मोबाइल क्रांति,  मंगलयान,  चंद्रयान, इन्टरनेट क्रांति, शिक्षा सुधार, GST, ये सभी नीतियां मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में लेकर आए।

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