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मदन द्वादशी पर चिरंजीवी पुत्र प्राप्ति का व्रत, जानें इसकी विधि

मदन द्वादशी पर चिरंजीवी पुत्र प्राप्ति का व्रत, जानें इसकी विधि

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चैत्र मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मदन द्वादशी का व्रत किया जाता है। जो इस बार 16 अप्रैल 2019 को आ रहा है। इस व्रत में काम पूजन की प्रधानता होती है इसीलिए इसे मदन द्वादशी कहा जाता है। मदन द्वादशी व्रत पर प्रातः उठकर स्नान करना चाहिए। पूजा स्थल पर भगवान विष्णु जी की प्रतिमा रखकर उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिए। पूजा करते हुए भगवान को फूल, फल, धूप, दीप, गंध आदि चढ़ाना चाहिए।

पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात को जागरण कीर्तन आदि करवाना चाहिए तथा दूसरे दिन स्नान करने के बाद ब्राह्मणों को फल और भोजन करवा कर उन्हें क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। अंत में स्वयं भोजन करना चाहिए। इसी प्रकार एक वर्ष तक यह व्रत रखना चाहिए। प्राचीनकाल में दिति ने अपने दैत्य पुत्रों की मृत्यु के बाद मदन द्वादशी का व्रत कर पुत्र रत्न को पुन्हा प्राप्ति किए थे।

कथा
एक बार प्राचीन काल में देवासुर संग्राम में देवताओं द्वारा पुरे दैत्यकुल का संहार कर दिया गया। जिसमें माता दिति के सभी दैत्य भी पुत्र मारे गए। इस पर माता दिति को घनघोर कष्ट हुआ और वह दुखी होकर सरस्वती नदी के तट पर अपने पति महर्षि कश्यप की आराधना करते हुए तपस्या करने लगी। किन्तु सौ वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भी उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। तब उन्होंने वशिष्ठ आदि महर्षियों से पुत्र शोक नाशक व्रत अर्थात् जिससे उसके पुत्र की मृत्यु का दुःख कम हो जाए, ऐसे व्रत के विषय में पूछा। तब महर्षि वशिष्ठ ने दिति को मदन द्वादशी व्रत करने का विधान बताया।

मदन द्वादशी व्रत का विधान सुनने के बाद दिति ने महर्षियों के निर्देशानुसार व्रत किया और महर्षि कश्यप दिति जब प्रगट हुए तब दिति ने उनसे ऐसे पुत्र का वरदान लिया जो बहुत पराक्रमी हो और देवताओं का भी वध कर सके। इस बात को जानकर इंद्र दिति के पास आए और उनकी सेवा करने की इच्छा प्रगट की किन्तु उनकी मंशा तो यह थी कि किसी तरह दिति का गर्भ नष्ट हो जाए और हुआ भी वैसा ही। दिति के गर्भावस्था के आखिरी दिनों में इंद्र का पैर दिति के सर पर लग गया और वह अपवित्र हो गई। पैर लगने के कारण उनके गर्भ के 7 टुकड़े हो गए, वैसे गर्भ पर प्रहार के बाद भी शिशु बच गए और दिति ने सात पुत्रों को जन्म दिया। 

तब दिति ने कहा कि मेरे गर्भ के ये टुकड़े सदा आकाश मे विचरण करेंगे और मरुत नाम से विख्यात होंगे, लेकिन एक मरुत के सात गण होने के कारण ये उन्नचास हो गए और आकाश में अलग-अलग जगह विचरण करने लगे। तब से ये उन्नचास गण मरुतगण के नाम से विख्यात हो गए। इंद्र को इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है उसने अपने ध्यान से उन्हें पता कर लिया कि मदन द्वादशी व्रत के प्रभाव के कारण दिति के बालक अमर हुए हैं। इस प्रकार मदन द्वादशी के व्रत से दिति को पुत्र की प्राप्ति हुई, इसलिए पुत्र प्राप्ति व सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

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