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तीन तलाक की मुहिम का असली 'हीरो', जिसे देश ने भुला दिया

BhaskarHindi.com | Last Modified - January 12th, 2018 09:04 IST

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज जिस मुद्दे ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। जिसकी गूंज घर की चार दीवारी से निकलकर संसद तक पहुंच गई है। हर पार्टी इसमें वोट बैंक की राजनीति ढूंढ रही है। जी हां, हम बात कर रहे हैं 'तीन तलाक' के मुद्दे की। क्या आपको पता है इसकी शुरूआत कब हुई थी? तीन तलाक का विरोध आज देश में बड़े व्यापक स्तर पर हो रहा है, लेकिन इस विरोध की नींव बहुत पुरानी है। साल 1960 में एक नौजवान ने ट्रिपल तलाक के खिलाफ आवाज मुखर कर अपना विरोध दर्ज कराया था। उस बहादुर नौजवान का नाम था 'हमीद दलवई'। इस बात मे कोई दो राय नहीं है कि सियासत के इस शोर में तीन तलाक के इस पहले आंदोलनकारी को भूल दिया गया है। वो नाम अब इतिहास की गुमनाम गलियों में कहीं खो गया है।

आखिर कौन था यह आंदोलनकारी
 

हमीद का जन्म 29 दिसंबर, 1932 को महाराष्ट्र के कोंकण में हुआ था। वो एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे। हमीद ने हमेशा से ही सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद रखी। हां वो बात अलग है कि उनका परिवार बिल्कुल उन्ही धार्मिक रुढियों से बंधा हुआ था जैसे बाकी मुस्लिम परिवार थे। फिर भी हमीद ने इन सबसे ऊपर बढ़कर अपने लिए एक अलग राह चुनी। वह राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। 

हमीद ने 60 और 70 के दशक में तीन तलाक के खिलाफ देश भर में न्याय की मशाल जला दी थी। वो हमीद ही थे जिन्होंने महिलाओं को हिम्मत दी कि वो आगे आएं और इस दलदल से निकल कर आवाज उठाएं। 

                                                 

1966 पहली बार तीन तलाक के खिलाफ उठी आवाज

दलवई ने इस आंदोलन की शुरूआत 1960 के दशक में ही कर दी थी। उन्होंने तलाक की सभी अवस्थाओं को खत्म करने के लिए अपनी आवाज उठाई लेकिन कांग्रेस विभाजन के परिणामों को याद कर इस मुहिम पर विचार करने के लिए राजी नहीं हुई। कांग्रेस को डर था कि किसी एक समुदाय के धार्मिक प्रावधानों में छेड़छाड के बाद देश में एक बार फिर विभाजन के स्वर उठ सकते हैं। जिसके बाद उन्होंने सुझाव दिया था कि शादी हो या फिर तलाक संवैधानिक दायरे में होने चाहिए। बहुत संघर्षो और विरोध झेलने के बाद दलवई ने बिना किसी राजनीतिक या संस्थागत समर्थन के 18 अप्रैल 1966 को 7 मुस्लिम महिलाओं के साथ मुंबई में विधानसभा के पास जुलूस निकाला।

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यह पहली बार था जब मुस्लिम महिलाएं अपने घर की चार दीवारी से बाहर न्याय की आस में हाथ में बैनर थामे नारे लगा रही थी। यह 7 महिलाएं खुद तीन तलाक का शिकार हो चुकी थी। महज 7 महिलाओं के मोर्चे की ये खबरे जब अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनीं तो पूरा मुस्लिम समाज हिल गया। रातों रात हमीद दलवई सुर्खियों में आ गए। मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के अध्यक्ष शम्सुद्दीन तम्बोली बताते हैं, 'वह मुस्लिम रेफॉर्म मूवमेंट की शुरुआत थी। महिलाओं ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक से मुलाकात कर न्याय की मांग की थी। यही नहीं उन्होंने बहुविवाह पर रोक लगाकर सामान्य नागरिक संहिता में सुधार करने के बारे में कहा था।' 


1970 में पहली बार मुस्लिम महिलाओं ने उठाई तीन तलाक के खिलाफ आवाज

हमीद का साथ पाने के बाद मुस्लिम महिलाओं ने बड़े ही बेखौफ तरीके से 1970 में पहली बार एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी अगुवाई में हुए इस बदलाव ने पूरे देश को झंकझोर के रख दिया था। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमीद के खिलाफ सभी तरफ आंदोलन शुरु हो गए। उनकी सभाओं और रैलियों में पथराव किए जाने लगे, साथ ही कई बार उन पर जानलेवा हमला भी हुआ। लेकिन वो पीछे नहीं हटे। यह उनके प्रयास ही थे जो उनके विरोधी बाद में उनकी मुहिम से जुड़ गए। 

झेलना पड़ा सामाजिक बहिष्कार

दलवई की ये पहल मौलवियों को रास नहीं आई जिसका खामियाजा हमीद को भुगतना पड़ा। दरअसल उस दशक में ट्रिपल तलाक, हलाला जैसे मुद्दों पर बोलना भी किसी पाप से कम नहीं होता था, लेकिन हमीद वो शख्स थे जो खुलकर इस मुद्दे पर सामने आए। उस समय उनके समर्थन में कोई नहीं था। जिसके बाद दलवई का सामाजिक रूप से जीवन भर के लिए बहिष्कार कर दिया गया था। 

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इंदिरा गांधी ने की हमीद की तारीफ

इतने विरोध और प्रदर्शन करने के बाद आखिर वो पल भी आया जब हमीद दलवई की मुहिम रंग लाई और बात दिल्ली तक पहुंच गई। उस समय राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जैल सिंह, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस मुहिम की तारीफ की और इसे एक साहसिक कदम बताया। पूर्व प्रधानमंत्री और उस समय के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस कदर दलवई के मुरीद हो गए थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया था कि हिंदू समाज को भी एक दलवई की आवश्यकता है।

किडनी खराब होने से हुई हमीद की मौत 

दलवई और उनकी पत्नी मेहरुन्निसा को उनके समुदाय से निकाल दिया गया था। दलवई का निधन 1977 में महज 44 साल की उम्र में किडनी खराब होने की वजह से हो गया था। दलवई की इच्छा के मुताबिक, उनके शव का अग्नि संस्कार किया गया। उन्हें समुदाय के लोगों द्वारा विरोध करने की वजह से दफनाया नहीं जा सका था। 

उनकी मौत के बाद पत्नी ने संभाली इस आंदोलन की कमान 

हमीद दलवई की मौत के बाद भी आंदोलन थमा नहीं। उनकी बीवी मेहरुनिसा ने इस मुहिम को जारी रखा।

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आज भले ही हमीद दलवई हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी लगाई हुई आग अब पूरे देश में फैल गई है। इस मुहिम को जीवन देने वाले दलवई को आज सभी लोग और राजनीतिक दल भूल चुके हैं। सरकार ने लोकसभा में तीन तलाक का बिल पास करा लिया है। जो फिलहाल राज्यसभा में अटका हुआ है। अगर यह बिल पास होता है तो मोदी सरकार की चारों तरफ बहुत वाह-वाही होगी। सरकार अपनी पीठ-थपथपाने से भी नहीं रूकेगी।

बहुत ही दुख की बात है उस शख्स को कोई श्रेय नहीं देगा जिसने अपना पूरा जीवन इस मुहिम में समर्पित कर दिया, क्योंकि तीन तलाक का वो हीरो सियासत के इस रंगमंच पर कहीं खो गया है जिसे ढूंढने के लिए शायद ही कोई प्रयास करे।

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