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दिव्यांग देशना जैन ने जीता मिस एशिया डेफ का खिताब, लाचारी नहीं ताकत है दिव्यांगता

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 03rd, 2018 20:41 IST

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दिव्यांग देशना जैन ने जीता मिस एशिया डेफ का खिताब, लाचारी नहीं ताकत है दिव्यांगता

डिजिटल डेस्क, टीकमगढ़। देशना जैन ने रचा इतिहास अपनी आम जिंदगी में किसी की सहानुभूति पसंद न करने वाली टीकमगढ़ की दिव्यांग देशना जैन ने एक नया इतिहास रचा है। मिस इंडिया डेफ  का खिताब जीतने के बाद उन्होंने मिस एशिया डेफ का खिताब भी अपने नाम किया। ऐसा पहली बार हुआ जब मिस एशिया डेफ में किसी भारतीय महिला ने पहला स्थान हासिल किया है। देशना व्यवसायी देवेंद्र बुखारिया की बेटी हैं। देशना जैन बोल व सुन नहीं पाती हैं, लेकिन वह कभी हार नहीं मानतीं। देशना के पिता देवेंद्र बुखारिया ने बताया कि उनकी बेटी किसी की सहानुभूति पसंद नहीं करती। उसे सिर्फ लोगों के प्यार के बोल ही सब कुछ हैं।

दिव्यांग बच्चों को शिक्षित कर रहे प्रदीप
विदेश प्रेमी युवाओं के सामने टीकमगढ़ के दिव्यांग प्रदीप कुमार पाटिया ने एक उदाहरण पेश किया है। उन्हें साल 2011 में जापान में ग्रेजुएशन का ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने ऑफर ठुकरा दिया। उच्च शिक्षा के बाद भी बेरोजगारी झेल रहे युवाओं के लिए शहर के प्रदीप कुमार पाटिया ने मिसाल पेश की है। प्रदीप का साल 2010 में नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द विजुअली हैंडीकेप्ट यूनिविर्सिटी देहरादून में डीपीटी डिप्लोमा के लिए चयन हुआ। दिसम्बर 2011 में सुकोवा यूनिवर्सिटी जापान की टीम आई। जापान से आए दल ने विज्ञान पर आयोजित सेमीनार में प्रैक्टिकल कराए। जिसमें प्रदीप ने पहला स्थान हासिल किया। उनके हुनर को देखते हुए टीम के सदस्यों ने प्रदीप को जापान से साइंस में ग्रेजुएशन डिग्री लेने का ऑफर दिया था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वे नहीं जा सके।

अब प्रदीप शहर के अनंतपुरा के पास स्कूल खोलकर सैकड़ों बच्चों की जिंदगी में रोशनी बिखेर रहे हैं। प्रदीप ने बताया कि घर में आय का कोई साधन नहीं है। मेरी तरह दो भाई भी रेटिना पिग्मिनटोसा बीमारी के शिकार हैं। पढ़ाई करने के बाद साल 2000 में प्रायवेट शुरू किया। इस दौरान कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 18 सालों के अथक प्रयास के बाद अब जीनियस एजुकेशन एकेडमी के नाम से स्कूल अच्छा चलने लगा है।

पिता का नाम रोशन कर रहे दिव्यांग अरविंद
पृथ्वीपुर ब्लॉक के मडिय़ा गांव में नेत्रहीन अरविंद अपने पिता स्व. मेहरबान सिंह का नाम रोशन कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिता के नाम पर विकलांग स्कूल खोला है। अरविंद ने बताया कि 10वीं कक्षा तक की शिक्षा प्रदेश के पहले विकलांग स्कूल माधव अंधाश्रम से पूरी की। इसके बाद 12वीं तक की पढ़ाई पृथ्वीपुर से और प्रायवेट ग्रेजुएशन किया है। उन्होंने बताया कि साल 2014-15 में विकलांग स्कूल शुरू किया। जिसमें सभी तरह के दिव्यांग छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। अरविंद को तबला बजाने में भी महारथ हासिल है। उन्होंने बताया कि इलाहाबाद से तबले का हुनर सीखा। अब स्कूल के बच्चों को पढ़ाई के साथ तबला बजाने की कला भी सिखा रहे हैं।

दिव्यांगता को मात देकर आगे बढ़े प्रदीप पाटिया मडिय़ा के अरविंद, टीकमगढ़ के प्रदीप कुमार पाटिया और देशना जैन कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने दिव्यांगता को मात देकर अपनी राह तय की है। अरविंद दांगी जन्म से ही नेत्रहीन हैं, लेकिन अपनी इस कमजोरी को उन्होंने कभी लाचारी नहीं बनाया। वहीं प्रदीप पाटिया को बचपन से कम दिखाई देता था। 12वीं कक्षा तक आते-आते दिखाई देना बंद हो गया। डॉक्टरों ने रेटिना पिग्मिनटोसा, आरपी बीमारी बताई। आंखों की रोशनी चली जाने के बाद भी प्रदीप ने आगे की पढ़ाई जारी रखी। शहर से बीए और बीएड करने के बाद देहरादून जाकर डिप्लोमा इन फिजियोथैरेपी, डीपीटी की पढ़ाई की।

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