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क्या वाकई लोगों की छवी सुधारने के लिए बनाई जाती हैं बॉलीवुड में बायोपिक

February 02nd, 2019 20:15 IST
क्या वाकई लोगों की छवी सुधारने के लिए बनाई जाती हैं बॉलीवुड में बायोपिक

डिजिटल डेस्क,मुबंई। पिछले कुछ सालों से बॉलीवुड में बायोपिक का दौर जोरों से चल रहा है, जिससे दर्शकों को देश के लिये कुछ कर गुजरने वाले लोगों के बारे में काफी कुछ जानने का मौका भी मिलता है। 'मैरी कॉम', 'एम.एस धोनी', 'दंगल', 'नीरजा' और 'सूरमा' जैसी सुपरहिट बायोपिक्स ने समाज को एक नया आईना भी दिखाया। ये तमाम बायोपिक देखने के बाद देश की कई लड़कियों को हिम्मत मिली, तो वहीं 'एम.एस धोनी' में हमें क्रिकेट खिलाड़ी धोनी के संघर्षों को करीब से देखने के मौका भी मिला। इन सबके अलावा और भी कई बायोपिक हैं, जिन्होंने दर्शकों की वाहवाही के साथ-साथ बॉक्स ऑफिस पर काफी अच्छा कलेक्शन भी किया। जैसे, इंडियन क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन की जिंदगी पर बनी 'अजहर', संजय दत्त की कहानी 'संजू' और हाल ही में रिलीज हुई 'मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी', 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' और बाल ठाकरे के जीवन पर बनी 'ठाकरे'।

लोग पिक्चर देखने सिनेमाघरों तक क्यों जाते हैं। ताकि, बायोपिक में दिखाए जाने वाले शख़्स की कहानी बिना किसी भेदभाव के जान सके, लेकिन बॉलीवुड की इन बायोपिक को देख कर ऐसा लगता है, जैसे ये सिर्फ और सिर्फ सेलेब्स की छवि सुधारने के लिये बनाई जा रही हैं। अजहरुद्दीन, संजय दत्त और बाल ठाकरे की फिल्म देखने के बाद ऐसा लगा, जैसे इन लोगों ने लाइफ में कोई गलती ही न की हो। इन फिल्मों को दस बार भी देखोगे, तब भी इनमें जरा सी गलती नहीं निकाल पाओगे। मानों इनसे जुड़ी सारी कंट्रोवर्सी सिर्फ अफवाह मात्र थी, लेकिन हकीकत में तो ऐसा संभव नहीं है।

सबसे पहले बात संजू की, जिसे देखने के बाद आपको सिर्फ यही लगेगा कि संजय दत्त जैसे मासूम शख़्स को हथियार रखने के इल्ज़ाम में फंसाया गया था। चलो ये मान भी लिया कि इसमें संजय दत्त की कोई गलती नहीं थी पर संजय दत्त का माफियों के साथ कुछ रिश्ता तो रहा होगा। इसीलिये शायद उन्हें जेल की सजा भी मिली और फिर ऐसा कैसे संभव है कि किसी के घर में अवैध हथियार रखे हुए हैं और उन्हें इसकी खबर तक नहीं हुई।  

वहीं दूसरी तरफ अगर आपने अज़हर फिल्म देखी हो तो उसके अंत में अज़हरुद्दीन बने इमरान बुकी से कहते हैं कि मैंने तेरे पैसे इसलिये लिए, ताकि तू किसी दूसरे ख़िलाड़ी के पास न चला जाए। अंमा यार तुम सबकी छोड़ो, अगर ऐसा कुछ था, तो BCCI के पास क्यों नहीं गये? हीरो बनकर ख़ुद की जिंदगी में मुसीबतें क्यों बुलाई? इसके बाद अब बाल ठाकरे को ही ले लो। पूरी दुनिया को पता है कि ठाकरे साहब कितने कंट्रोवर्शियल शख़्स थे लेकिन फिल्म में उन्हें भगवान की तरह पेश किया गया। इसके साथ ही मणिकर्णिका देखने के बाद ऐसा लगा, जैसे हम झांसी की रानी नहीं, बल्कि कंगना की कहानी देख रहे हैं। 

बायोपिक बनाने का मतलब किसी कहानी के साथ न्याय करना, लोगों तक अधूरे सच को पूरा पहुंचाना वो भी बिना किसी भेदभाव के। बायोपिक का मतलब सिर्फ और सिर्फ हकीकत पेश करना होता है।  


 

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