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कार्तिक मास में करें इन नियमों का पालन 

October 30th, 2018 00:26 IST
कार्तिक मास में करें इन नियमों का पालन 

डिजिटल डेस्क, भोपाल। हिन्दू महिना कार्तिक मॉस 25 अक्टूबर 2018 से शुरू हो गया है। यह 23 नवम्बर 2018 तक रहेगा। इस कार्तिक मास में सृष्टि के मूल सूर्य की किरणों का उत्तरायण और दक्षिणायन में होना जगत का आधार है। भगवान नारायण के शयन और प्रबोधन से चातुर्मास्य का प्रारंभ और समापन होता है। उत्तरायण को देवकाल और दक्षिणायन को आसुरिकाल माना जाता है। दक्षिणायन में सत्गुणों के क्षरण से बचने और बचाने के लिए हमारे शास्त्रों में व्रत और तप का विधान दिया गया है।

सूर्य का तुला राशि पर आगमन दक्षिणायन का प्रारंभ माना जाता है और कार्तिक मास इस अवधि में ही होता है। पुराण आदि शास्त्रों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। यूँ तो हर मास का भिन्न-भिन्न महत्व होता है। परन्तु व्रत, तप की दृष्टि से कार्तिक मास की महत्ता अधिक है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु और विष्णु तीर्थ के ही समान कार्तिक मास को श्रेष्ट और दुर्लभ कहा गया है। शास्त्रों में इस मास को परम कल्याणकारी बताया गया है।

सूर्य देव जब तुला राशि में आते हैं तो कार्तिक मास का प्रारंभ होता है। इस मास का महात्म्य पद्मपुराण तथा स्कन्दपुराण में सविस्तार पूर्वक दिया गया है। कार्तिक मास में स्त्रियां ब्रम्ह महूर्त में स्नान कर भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की पूजा करती हैं। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है। पुराणों में इस मास को धर्म, अर्थ काम और मोक्ष को देने वाला बताया गया है। श्री हरी नारायण भगवान ने स्वयं इसे ब्रम्हा को, ब्रम्हा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण सम्पन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है।

इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति सुख शांति और परम आनंद की कामना की चाह करता है किन्तु प्रश्न यह है कि सभी दुखों से मुक्ति कैसे प्राप्त हो? इसके लिए हमारे धर्म शास्त्रों में कई प्रकार के उपाय नियम बताए गए हैं। किन्तु कार्तिक मास की महिमा अत्यधिक उच्च कोटि की बताई गई है। इस मास में स्नान का व्रत लेने वालों को कई संयम नियमों का पालन करना बताया गया है एवं श्रद्धा भक्ति पूर्वक भगवान की साधना किस प्रकार करनी चाहिए ये भी बताया गया है।

शास्त्रों में कार्तिक मास का विशेष महत्व बताया गया है। कार्तिक मास की महिमा देवों ने भी गाई है। हिंदी पंचांग के अनुसार कार्तिक मास वर्ष का आठवां महीना होता है। कार्तिक मास को हिन्दू धर्म ग्रंथों धार्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। कार्तिक मास का पुण्यकाल अश्विन शुक्ल पूर्णिमा अर्थात शरद पूर्णिमा से ही आरंभ हो जाता है। जिसका दीपावली पर अंत होता है।

शरद पूर्णिमा के दिन 5 कार्य महत्वपूर्ण बताए गए हैं। कार्तिक मास में श्री हरी विष्णु आराधना करने के लिए पांच नियम आचरणों के पालन का बहुत महत्व बताया गया है। इनके पालन से भगवान श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन को धन्य करते हैं। ये सभी कर्म मुख्य रूप से सर्वमान्य ही होते हैं।

कार्तिक मास में कुछ कार्य प्रधान रूप से माने गए हैं जो इस प्रकार हैं

1- स्नान,दीपदान 
2- तुलसी पूजा, तुलसी आरोहण 
3- भूमि पर शयन 
4- ब्रह्मचर्य पालन  
5- द्विदलन निषेध


कार्तिक मास में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि का सेवन निषेध होता है।

कार्तिक मास में प्रात: काल में किसी नदी, तालाब या बावड़ी में स्नान कर के भगवान श्री हरी की पूजा की जाती है। इस मास में व्रत करने वाली स्त्रियां अक्षय नवमी (आंवला नवमी) को आंवले के वृक्ष तले भगवान श्री कार्तिकेय की कथा सुनती एवं सुनती है और इसके बाद ब्राह्मण को अन्न, धन दान में दिए जाते हैं।

इसके साथ ही अविवाहित कन्या एवं बालकों को ब्राह्मणों के सानिध्य में भोजन कराया जाता है। कार्तिक मास कई अर्थों में अन्य महीनों से अधिक महत्व रखता है। कार्तिक मास की अमावस्या को प्रकाश पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री विष्णु की पत्नी महालक्ष्मी जी सर्वत्र निशा भ्रमण रहती है और हर प्रकार से जनमानस को धन धान्य से परिपूर्ण करती है।

कार्तिक मास को रोगों का विनाशक माना गया है। वहीं इसे सद्बुद्धि प्रदान करने वाला, लक्ष्मी को देने वाला तो कहीं मुक्ति प्रदान करने वाला साधन भी बताया गया है। कार्तिक मास में विशेष रूप से दीप दान करने का विधान बताया गया है और आकाश दीप भी जलाया जाता है कार्तिक मास का दूसरा प्रमुख कार्य तुलसी वन पालन है। वैसे तो तुलसी का उपयोग प्रत्येक मास में कल्याणकारी ही होता है।

किन्तु साथ ही कार्तिक मास में तुलसी जी की आराधना विशेष मानी गई है। वैसे तो आयुर्वेद में तुलसी को सभी रोगों को हरने वाला बताया ही गया है किन्तु भक्तिपूर्वक तुलसी पत्र या मञ्जरी से भगवान श्री हरी की पूजा करने से अनंत कोटि फल प्राप्त होते है। कार्तिक मास में तुलसी जी का आरोपण (घर में तुलसी पौधा लगाना) का विशेष महत्व होता है।

कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख कार्य है भूमि पर शयन करना। भूमि पर शयन करने से सात्विकता में वृद्धि होती है। भूमि अर्थात प्रभु के चरणों में शयन करने से जीव भी मुक्त होता है। कार्तिक मॉस का चौथा मुख्य कार्य है। ब्रह्मचर्य का पालन करना इस मास में ब्रह्मचर्य का पालन मन को जगत की काम्वास्नाओं से दूर करता है।

पांचवा कार्य दिव्द्ल्व्र्जन (दो दल के अनाज) को माना गया है। जैसे उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राइ, सरसों आदि का कार्तिक मास में सेवन निषेध बताया गया है और कार्तिक मास का व्रत करने वाले को चना, मटर, दालों, तिल का तेल, पकवान, भाव तथा शब्द से दूषित पदार्थों का त्याग कर के रहना चहिए।

कार्तिक मास को वर्तमान के संदर्भ में देखें तो पता चलता है कि पीपल वृक्ष की पूजा में तुलसी वन का पालन करना एवं पूजन करना आंवला वृक्ष का पूजन करना, गाय की पूजा करना, गंगा में स्नान करना, गोवर्धन पर्वत की पूजा एवं परिक्रमा करना आदि इन सभी काम से हम पर्यावरण की शुद्धि करते हैं।

हम सब प्रकृति से अपना प्रेम दर्शाते हैं इस कार्तिक मास के व्रत से लोक और परलोक दोनों में यश, बुद्धि, बल, धन,सत्संग तथा आत्म शुद्धि कर मोक्ष की प्राप्ति कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। जो भी व्यक्ति कार्तिक मास में श्रद्धा भक्ति एवं अपने विश्वास से किसी उत्सव की तरह मनाता है उस जातक को सभी वस्तुएं ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो जाती हैं। 

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