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बुधप्रदोष व्रत से होते हैं सभी दुख दूर, जानें पूजा विधि  

बुधप्रदोष व्रत से होते हैं सभी दुख दूर, जानें पूजा विधि  

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। त्रयोदशी अथवा प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार आता है। एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष। इस व्रत में भगवान शिव की पूजा की जाती है। यह प्रदोष व्रत करने से जातक के सभी पाप धुल जाते है और उन्हें शिव धाम की प्राप्ति होती है। इस बार बुधप्रदोष व्रत तिथि 17 अप्रैल 2019 को दिन बुधवार को है। आइए जानते हैं क्या है बुधप्रदोष व्रत का महत्व औैर क्या है इसकी पूजा विधि ?

महत्व
बुधप्रदोष का व्रत करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है। उसके सम्पूर्ण पापों का नाश इस व्रत से हो जाता है। इस व्रत के करने से सुहागन नारियों का सुहाग सदा अटल रहता है, बंदी कारागार से छूट जाता है। जो स्त्री पुरुष जिस कामना को लेकर इस व्रत को करते हैं, उनकी सभी कामनाएं शंकरजी पूरी करते हैं। सूत जी कहते हैं- बुधप्रदोष व्रत करने वाले को सौ गाय के दान बराबर फल प्राप्त होता है। इस व्रत को जो विधि विधान और तन, मन, धन से करता है उसके सभी दु:ख दूर हो जाते हैं।

पूजन सामग्री 
धूप, दीप, घी, सफेद पुष्प, सफेद फूलों की माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाइयां, सफेद चंदन, सफेद वस्त्र, जल से भरा हुआ कलश, कपूर, आरती के लिए थाली, बेल-पत्र, धतुरा, भांग, हवन सामग्री, आम की लकड़ी। 

व्रत की विधि 
प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिए। पूरे दिन मन ही मन “ॐ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें।

त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिए। प्रदोष व्रत की पूजा संध्या को 4:30 बजे से लेकर 7:00 बजे के मध्य की जाती है। इस दिन व्रती को चाहिए कि संध्या में पुन्हा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें। पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। 

पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ॐ नम: शिवाय” बोलते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें।

ध्यान का स्वरूप 
करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।

ध्यान के बाद, बुध प्रदोष की कथा सुने अथवा सुनाएं। कथा समाप्ति के बाद, हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें। इसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित लोगों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें। इसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी वास्तु का उपयोग करें।

बुध प्रदोष कथा
एक बार सूत जी बोले कि अब मैं आप लोगों को बुधवार त्रयोदशी व्रत की कथा तथा विधि सुनाता हूूं। इस व्रत के दिन केवल एक ही समय भोजन करें। हरे वस्त्र पहनें और हरी वस्तुओं का सेवन करें। प्रात: काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो कर शंकर जी का पूजन धूप-दीप,बेल पत्र से करें। प्राचीन काल की कथा है, एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ था। वह गौने के बाद दूसरी बार पत्नी को लिवाने के लिए अपनी ससुराल पहुंचा और उसने सास से कहा कि बुधवार के दिन ही पत्नी को लेकर अपने नगर जाएगा। उस पुरुष के ससुराल परिवार के सदस्यों ने उसे  समझाया कि बुधवार को पत्नी को विदा कराकर ले जाना शुभ नहीं है, लेकिन वह पुरुष नहीं माना। 

जब पति-पत्नी बैलगाड़ी में चले जा रहे थे। इसी बीच जब अपनी पत्नी को प्यास लगने पर वह पुरुष पानी लेने गया, लेकिन लौटकर अपनी पत्नी को दूसरे अपने ही जैसे पुरुष के साथ हंसकर बात करते हुए देखता है और क्रोधित हो उठता है। दोनों में झगड़ा होता है, लेकिन दो एक जैसी शक्ल के पुरुष होने पर पत्नी भी अपने पति को नहीं पहचान पाती। इस दौरान वह पुरुष मन ही मन शंकर भगवान की प्रार्थना करने लगा कि हे भगवान मुझे और मेरी पत्नी को इस मुसीबत से बचा लो, वह अपने भगवान से क्षमा मांगता है। शंकर भगवान उस पुरुष की प्रार्थना से द्रवित हो गए और उसी क्षण वह अन्य पुरुष कही अंतर्ध्यान हो गया। वह पुरुष अपनी पत्नी के साथ सकुशल अपने नगर को पहुंच गया। इसके बाद से दोनों पति-पत्नी नियमपूर्वक बुधवार प्रदोष व्रत करने लगे।

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