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सीएम चौहान का गृह जिला जहां 25 साल से किसी भाजपाई को नहीं मिला टिकट

सीएम चौहान का गृह जिला जहां 25 साल से किसी भाजपाई को नहीं मिला टिकट

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस वक्त मप्र भाजपा के पोस्टर बॉय हैं। भोपाल से लेकर दिल्ली तक पार्टी उनके भरोसे एमपी में लगातार चौथी बार सरकार बनाने का सपना देख रही है। वे सीहोर जिले के निवासी हैं। भाजपा मप्र संगठन की देश भर में मिसाल दी जाती है, इसके बाद भी सीएम के गृह जिले के मुख्यालय पर 25 साल से भाजपा पूरी तरह गायब रही है। यहां इन पांच चुनावों में भाजपा नेतृत्व कोई ऐसा कार्यकर्ता तैयार नहीं कर सका जो विधानसभा का चुनाव लड़ सके, या ये माना जाए कि भाजपा को सीहोर के भाजपाइयों में वो क्वालिटी ही नहीं दिखी। हालांकि जो दर्द भाजपा के मूल कार्यकर्ता को है, वहीं दर्द सीहोर की जनता को भी है कि यहां कई बार कांग्रेस और भाजपा दोनों ने बाहरी प्रत्याशियों को अपना उम्मीदवार बनाया।

तीन बाहरी नेता जीते चुनाव
राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि सीहोर के साथ अन्याय की शुरूआत 1972 में हुई थी। जब भोपाल में रहने वाले अजीज कुरैशी को कांग्रेस ने सीहोर लड़ने के लिए भेजा था, वे जीत भी गए। अगले चुनाव में जनता पार्टी ने भोपाल से सविता वाजपयी को भेजा और वे भी चुनाव जीत गईं। इसके बाद 1980 में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा नीमच छोड़ कर सीहोर पहुंच गए और विजयी हुए।

1993 से मूल भाजपाई नहीं लड़ा चुनाव
सीहोर, जनसंघ और भाजपा का गढ़ रहा है। कभी भोपाल शहर सीहोर जिले के अंतर्गत आता था। यहां 1985 में कांग्रेस के शंकरलाल साबू विधायक चुने गए थे। इसके बाद 1986 में जब रामजन्मभूमि के दरवाजे खुलने के बाद अगले चुनाव में सीहोर में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली। सीहोर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद वोट का ध्रुवीकरण हुआ और कांग्रेस से भाजपा में आए मदनलाल त्यागी को 1990 के चुनाव में राम लहर की मदद से जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के शंकरलाल साबू को हराकर चुनाव जीता। 1993 में फिर त्यागी और साबू आमने सामने थे, लेकिन कांग्रेस के सहकारी नेता रमेश सक्सेना ने टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस से बगावत कर दी। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों हार गईं और निर्दलीय समेश सक्सेना विधायक बन गए।

सीहोर की राजनीति का टर्निंग पाइंट
1993 में सक्सेना का विधायक बनना सीहोर की राजनीति का टर्निंग पाइंट था। वे निर्दलीय थे, कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई थी। जब 1998 के चुनाव आए तो भाजपा ने सक्सेना को पार्टी में शामिल करते हुए उन्हें टिकट दे दिया। 1998, 2003 और 2008 में भी सक्सेना ही यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतते रहे। 2013 के चुनाव के ठीक पहले एक मामले में सक्सेना को सजा हो गई, ऐसे में भाजपा ने उनकी पत्नी उषा सक्सेना को टिकट दे दिया। 2013 में कांग्रेस ने नए चेहरे हरीश राठौर को मौका दिया, फिर कांग्रेस में बगावत हुई और कांग्रेस से टिकट के दावेदार सुदेश राय बागी हो गए। नजदीकी मुकाबले में वे जीत गए।

कांग्रेस के बागियों को भाजपा ने अपनाया
यह भी संयोग है कि 1993 और 2013 दोनों बार बीस साल के अंतराल में बगावत कांग्रेस में ही हुई। दोनों बार कांग्रेस के बागी जीते लेकिन उन्हें अपनाया भाजपा ने। सक्सेना की ही तरह सुदेश राय भाजपा में आ गए। भाजपा नेतृत्व भी लंबे समय से सक्सेना का विकल्प तलाश रहा था। इस बार 2018 में सुदेश राय भाजपा प्रत्याशी हैं और उषा सक्सेना भाजपा की बागी।

संगठन को भाजपा कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं
रमेश सक्सेना की भाजपा में आमद के बाद जिले में भाजपा की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ही रही। ऐसा 2013 तक हुआ। इन 20 सालों में जनसंघ और जनता पार्टी के कार्यकर्ता घर बैठते गए। नगर पालिका चुनाव में भी यही हुआ। 2015 के चुनाव में भाजपा ने जसपाल अरोरा की पत्नी को टिकट दिया। जसपाल कांग्रेस के टिकट पर नपा अध्यक्ष रह चुके थे। एक वक्त ऐसा आया कि सीहोर में कांग्रेस से आए सक्सेना, राय और अरोरा तीनों ही पावर में थे और शहर की पूरी राजनीति इन तीनों के इर्द-गिर्द रही। भाजपाई धीरे धारे घर बैठते गए। मूल भाजपाई सुदर्शन महाजन, महेंद्र सिंह सिसोदिया, मदनलाल त्यागी, श्रीकिशन मुनीम, हीरालाल साहू, गौरव सन्नी महाजन, बद्री प्रसाद चौरसिया, स्वर्गीय कस्तूरचंद परिहार, स्वर्गीय गोपाल दास राठौर हाशिए पर चले गए।

इस बार चतुष्कोणीय मुकाबला
मुख्यमंत्री के गृह जिला मुख्यालय पर इस बार चतुष्कोणीय मुकाबला है। भाजपा के सुदेश राय, कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह ठाकुर के अलावा गौरव महाजन सन्नी और उषा सक्सेना मैदान में हैं। महाजन भाजपा से दूसरी बार बागी हुए हैं। उनके पिता सुदर्शन महाजन भाजपा के जिलाअध्यक्ष और पटवाजी के चुनाव संचालक रहे हैं। अब मूल भाजपाई और जनसंघी किसे वोट देते हैं, यह 11 दिसंबर को पता चलेगा। सुदेश राय भी भाजपाई जंग में रंग चुके है. नपा चुनाव और लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा को सपोर्ट दिया था।

क्या कहते हैं राजनीतिक प्रेक्षक

प्रदेश के जाने माने राजनीतिक विश्लेषक राघवेंद्र सिंह कहते हैं कि सीहोर में मूल भाजपा का खत्म होना भाजपा के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। खुद मुख्यमंत्री इसी जिले के हैं। सीहेार को सीएम का जिला माना जाता है। इसमें दीनदयाल परिसर में बैठे भाजपा नेताओं की संगठन क्षमता पर भी सवाल उठते है कि भोपाल से 37 किमी दूर सीहोर में भाजपा जड़ से गायब है और वह पूरी तरह बाहर से आने वालों पर निर्भर हो गई है। 

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