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चौथे दिन करें माता कूष्मांडा देवी की पूजा

BhaskarHindi.com | Last Modified - October 12th, 2018 20:02 IST

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चौथे दिन करें माता कूष्मांडा देवी की पूजा

डिजिटल डेस्क। नवरात्रि पूजा के चौथे दिन माता कुष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन पूजक या साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है। इस दिन साधक को बिलकुल पवित्र और स्थिर मन से माता कूष्मांडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर साधना पूजा-उपासना करना चाहिए। शून्यकाल में जब सृष्टि का अस्तित्व ही नहीं था, तब कूष्मांडा देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। कूष्मांडा माता ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। माता का निवास स्थान सूर्यमंडल के भीतर लोक में मना जाता है। सूर्यमंडल में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं देवी में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा-प्रभा भी सूर्य के समान ही प्रकाशमान हैं।

इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में कूष्मांडा देवी की ही छाया है। कूष्मांडा माता की आठ भुजाएं हैं। माता अष्टभुजाधारी नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इनके सात हाथों में तो कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सिद्धि और निधि को देने वाली जपमाला है। कूष्मांडा देवी का वाहन सिंह है।


स्तुति श्लोक

सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे ॥

देवी माता कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक एवं कष्ट समाप्त हो जाते हैं। माता की भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माता कूष्मांडा अल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली देवी हैं। कोई भी जातक यदि सच्चे हृदय से इनकी शरणा जाता है तो फिर उसे अत्यन्त सरल सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है। विधि-विधान से माता की भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का अनुभव होने लगता है। माता की उपासना जातक को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेष्ठ मार्ग है।

कूष्माण्डा माता की साधना जातक को आधि-व्याधियों से मुक्त कर सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती हैं। लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वाले जातकों को माता की उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए। नवरात्रि में चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है।

 
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।


या देवी सर्वभूतेषु माँकूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ :- 

हे मां! सर्वत्र विराजमान माताकूष्मांडा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। 
या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।


माता को अपनी मंद मुस्कान और हँसी के द्वारा अंड और ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के रूप में पूजा जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्मांडा को कुम्हड़ कहते हैं। बलि करने में कुम्हड़े(सफेद कद्दू) की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी माता कूष्मांडा कहा जाता है।


नव रात्रि के चोथे दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए और उनको भोजन में दही, हलवा खिलाना बहुत श्रेष्ठ होता है। फिर फल, सूखे मेवे और सुहाग सामग्री भेंट करना चाहिए। जिससे कूष्मांडा माता बहुत प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फल को प्रदान करती है।

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