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पानसरे हत्याकांड की जांच से नाराज हाईकोर्ट ने कहा - जनता की सुरक्षा नहीं कर सकते तो नेता न लड़ें चुनाव

March 14th, 2019 21:30 IST
पानसरे हत्याकांड की जांच से नाराज हाईकोर्ट ने कहा - जनता की सुरक्षा नहीं कर सकते तो नेता न लड़ें चुनाव

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद पानसरे मामले की जांच के लिए सामान्य तरीका अपना कर सरकार हास्य का पात्र बन गई है। प्रकरण की जांच से खिन्न हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के दौरान राज्य के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को अदालत में तलब किया है। कोर्ट ने कहा कि यदि नेता देश की जनता की सुरक्षा नहीं कर सकते है तो वे चुनाव न लड़े। न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी व न्यायमूर्ति बीपी कुलाबावाला की खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव को स्पष्ट करने को कहा है कि पानसरे मामले की धीमी जांच की वजह क्या है और क्या मामले की धीमी जांच उनके लिए चिंता का विषय नहीं है? हम चाहते हैं सरकार भी इस मामले में दबाव महसूस करे और एक दिन वह भी इसका परिणाम भुगते। अक्सर देखा गया है कि आपराधिक मामलों की जांच करनेवाली पुलिस बिना किसी जिम्मेदारी के बच निकलती है, उन्हें न कोई मेमो जारी किया जाता है और न ही उनसे कोई सफाई मांगी जाती है। हद तो यह है कि उन्हें अपराध की जांच कैसे प्रभावी तरीके से की जाए इसका समय-समय पर सेवानिवृत्त अधिकारियों के माध्यम से प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता। खंडपीठ ने कहा कि यदि अपराध की जांच सिर्फ अदालत के हस्तक्षेप के बाद की जाएगी तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रकरण दर प्रकरण सिर्फ न्यायपालिका ही संरक्षक के रुप में आगे आएगी तो इससे पुलिस की जनता के मन में क्या छवि बनेगी? इससे पहले खंडपीठ ने पानसरे व सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर मामले की जांच को लेकर लेकर पेश की गई प्रगति रिपोर्ट को देखने के बाद कड़ी अप्रसन्नता व्यक्त की। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) पानसरे मामले की जांच कर रही है जबकि सीबीआई दाभोलकर प्रकरण की तहकीकात कर रही है। खंडपीठ ने रिपोर्ट पर गौर करने के बाद पाया कि पानसरे मामले में फरार आरोपियों की तलाश के लिए पुलिस सिर्फ आरोपियों के रिश्तेदारों से पूछताछ कर रही है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि एसआईटी इस बात को समझे की पानसरे हत्या मामले को चार साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम है कि आरोपी महाराष्ट्र में होंगे। वे देश के दूसरे हिस्से में जाकर भी रह सकते हैं। आरोपी की सिर्फ पुणे में अचल संपत्ति है, इसका मतलब वह यहां आएगा इसकी संभावना कम ही है। वह देश के किसी भी कोने में जा सकता है। फिर भी पुलिस आरोपी के रिश्तेदारों से पूछताछ कर रही है। 

यह कोई हिंदी फिल्म नहीं 

अदालत ने कहा जांच का यह तरीका जग हंसाई व उपहास का पात्र बनाने वाला है। पुलिस की निष्क्रियता के चलते जनता के मन में यह धारणा बनती है अपराध करके बचा जा सकता है। यह मामला कोई हिंदी फिल्म नहीं है। जैसे फिल्मों में पुलिस घटना  के बाद घटना स्थल पर पहुंचती है। वह ऐसे मामले में मूकदर्शक नहीं रह सकती। महराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य को अपने यहां के विचारकों, तर्कवादियों व लेखकों पर गर्व करना चाहिए। इस दौरान खंडपीठ ने पानसरे मामले की जांच कर रहे आईपीएस अधिकारी टी काकडे को भी कड़ी फकार लगाई। गौरतलब है कि साल 2013 में पुणे में सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जबकि 16 फरवरी 2015 को कोल्हापुर में पानसरे की गोली मारकर हत्या की गई थी।  

मनपा के रवैए पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, बहुत सहनशील हैं मुंबईकर, तभी सड़कों का है यह हाल

वहीं बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि मुंबई वालों की सहशीलता का स्तर काफी उंचा  है, जिसके चलते मुंबई महानगरपालिका सड़को की खराब स्थिति को लेकर असंवेदनशील बनी हुई है। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश नरेश पाटील व न्यायमूर्ति एनएम जामदार की खंडपीठ ने सड़कों की स्थिति सुधारने को लेकर मनपा द्वारा अदालत के आदेश की अनदेखी करने पर उपरोक्त टिप्पणी की। खंडपीठ ने कहा कि मनपा ने इस मामले में बेहद असवंदेनशील रुख अपनाया है। नागरिकों को अच्छी सड़के प्रदान करना मनपा की बुनियादी जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट ने अपने पिछले अादेश में मनपा को सड़कों के गड्ढों की शिकायत के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने को कहा था। गड्ढे भरने के लिए अच्छी तकनीक अपनाने व सड़क सुरक्षा को लेकर कई आदेश दिए थे।
खंडपीठ ने कहा कि कुछ समय बाद मानसून दस्तक देगा। इससे पहले मनपा को अापदा प्रबंधन, नाला सफाई व सड़को की स्थिति सुधारने के लिए अपनी योजना तैयार रखनी चाहिए। ऐसा नहीं है मनपा को इन सारे मुद्दों की जानकारी नहीं है। लेकिन मनपा यह जानती है कि यहां (मुंबई) के लोग काफी सहनशील हैं वे सबकुछ सह लेंगे। इस शहर के लोगों के धैर्य का स्तर काफी उंचा है। वे सुविधाओं के अभाव को भी सह लेंगे। इससे पहले मुंबई मनपा की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल साखरे ने कहा कि मनपा ने सड़कों की स्थिति सुधारने व सड़कों के गड्ढे भरने की दिशा में कई प्रभावी कदम उठाए हैं। जिसकी जानकारी देने के लिए उन्हें समय दिया जाए। इसके बाद खंडपीठ ने मामले की सुनवाई एक सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दी। गौरतलब है कि खराब सड़कों व सड़कों में गड्ढे के मुद्दे का खुद संज्ञान लिया और उसे जनहित याचिका में परिवर्तित किया है। 
 

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