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सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद निचली अदालत में दायर की याचिका,  सॉ मिल संचालक पर एक लाख की कॉस्ट  

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद निचली अदालत में दायर की याचिका,  सॉ मिल संचालक पर एक लाख की कॉस्ट  

डिजिटल डेस्क, नागपुर।  सर्वोच्च न्यायालय से प्रकरण का निपटारा हो जाने के बाद उसी प्रकरण पर नए सिरे से निचली अदालत में याचिका दायर करने वाले गोंदिया के एक सॉ मिल संचालक पर हाईकोर्ट ने 1 लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया है। सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राज्य सरकार के सुधाकर ठाकरे व अन्य के खिलाफ द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला लिया है।

हाईकोर्ट के नोटिस जारी करने और बार-बार अवसर देने के बावजूद मिल संचालक की ओर से हाईकोर्ट में पक्ष नहीं रखा गया। अंतत: राज्य सरकार की अर्जी मान्य करते हुए हाईकोर्ट ने प्रतिवादी पर यह जुर्माना लगाया है। मामले में सरकार की ओर से सरकारी वकील नितीन पाटील ने पक्ष रखा। जंगल के पास स्थित 1980 के पूर्व स्थापित सॉ मिलों को राज्य सरकार ने बंद करने के आदेश दिए। इसके बाद स्थापित मिलों के लिए लाइसेंस जारी किए। इस प्रकरण से जुड़े मिल संचालक को भी 1980 के पूर्व वाली सूची में डाला गया था। विविध विविध अदालतों से होते  हुए यह प्रकरण  देश की सर्वोच्च अदालत पहुंचा और सर्वोच्च अदालत वर्ष 2012 के दौरान इस पर फैसला सुनाते हुए सरकार का निर्णय कायम रखा। उस वक्त प्रकरण से जुड़े मिल संचालक भी सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थी अर्जदार थे।

सर्वोच्च न्यायालय से फैसला होने के बाद मिल संचालक ने फिर नए सिरे से गोंदिया के दीवानी न्यायालय में अर्जी दायर की और बताया कि, सर्वोच्च न्यायालय में उनके कई तथ्यों पर गौर नहीं किया गया। सरकार ने इस अर्जी का विरोध किया कि, सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकरण से जुड़े सभी पहलुओं को सुनकर निर्णय दिया था। संचालक को सर्वोच्च न्यायालय के सामने ही सारी दलीलें रखनी चाहिए थी। दिवानी न्यायालय ने मिल संचालक की अर्जी खारिज कर दी, लेकिन सरकार चाहती थी कि, निचली अदालत इस प्रकरण का पूर्ण रूप से निपटारा कर दें। ऐसे में सरकार ने हाईकोर्ट में अर्जी दायर की। हाईकोर्ट द्वारा मिल संचालक काे नोटिस जारी हुआ। बार-बार समय देने के बावजूद मिल संचालक की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। जिसके बाद हाईकोर्ट ने यह निर्णय लिया है। 
 
 

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