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शीतला षष्टी व्रत रखकर करें संतान सुख के लिए कामना

February 11th, 2019 08:39 IST
शीतला षष्टी व्रत रखकर करें संतान सुख के लिए कामना

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शीतला षष्टी का व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि अथवा छठी तिथि को किया जाता है, जो इस वर्ष इस बार 11 फरवरी 2019 को है। इस व्रत के प्रभाव से संतान-सुख तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इस व्रत को बासोरा भी कहा जाता है। यह व्रत पश्चिम बंगाल, मध्य और उत्तर भारत में प्रचलित है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है।

शीतला षष्टी व्रत के कुछ नियम:-
स्नान के लिए गर्म जल का प्रयोग निषेध होता है।
इस दिन व्रती को गर्म भोजन नहीं करना चाहिए।
इस व्रत के दिन आग बिलकुल नही जलाएं।
घर के सभी सदस्य बासा भोजन ही करे।

शीतला षष्टी व्रत के पूजन की सामग्री:-
शीतला माता की प्रतिमा, वस्त्र, धूप, दीप, घी, कपूर, पुष्प, पुष्पमाला, अक्षत, चंदन, जल-पात्र, आसन, नैवेद्य (एक दिन पूर्व बना हुआ भोजन), चौकी अथवा लकड़ी का पटरा

शीतला षष्ठी व्रत विधि 
प्रात:काल उठ कर नित्य क्रिया से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को शुद्ध कर लें। पूजा के लिए सभी नैवेद्य अथवा भोग एक दिन पूर्व हीं बना कर रख लें। लकड़ी के पटरे अथवा चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछाकर, उस पर शीतला माता की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। स्वयं आसन पर बैठ जाएं। 

माता का आवाहन:- 
सबसे पहले हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र के साथ शीतला माता का आवाहन करें:-

“ॐ श्रीं शीतलायै नमः, इहागच्छ इह तिष्ठ” 

जल माता के चरणों पर अर्पित करें।
आसन :-  हाथ में वस्त्र अथवा मौली लेकर आसन के रूप में माता को अर्पित करें।
पाद्य :-  चरणों को धोने के लिए जल अर्पित करें।
आचमन:- आचमन करने के लिए जल अर्पित करें।
स्नान :- अब स्नान लिए जल अर्पित करें।
वस्त्र :- वस्त्र मंत्र के साथ वस्त्र अर्पित करें।

इदं वस्त्र समर्पयामि , ॐ श्रीं शीतलायै नमः
उपवस्त्र:- अब उपवस्त्र अर्पित करें।
गंधाक्षत –  चंदन तथा अक्षत का तिलक अर्पित करें।
पुष्प – पुष्प एवं पुष्पमाला अर्पित करें।
धूप,दीप –धूप, दीप दिखाएं।
नैवेद्य – जो बासा कल रात बनाया हो उस भोजन का भोग अर्पित करें।
आचमन :- अब आचमन के लिए पुन: जल अर्पित करें।
शीतला षष्ठी व्रत कथा:- अब शीतला षष्ठी व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं।
आरती:- कथा के बाद शीतला माता की आरती करें।

जल से प्रोक्षण कर शीतला माता तथा सभी देवी-देवताओं को आरती दिखाएं। उसके बाद उपस्थित जनों को आरती दें।फिर पुष्पांजलि :- हाथ में फूल लेकर मंत्र के साथ पुष्पांजलि अर्पित करें।

पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना :- दोनों हाथ जोड़कर शीतला माता से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहे :-

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥
मन्त्रहीन क्रियाहींन भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥

इसके बाद उपस्थित जनों में प्रसाद वितरित करें तथा स्वयं भी भोजन ग्रहण करें।

शीतला षष्टी व्रत कथा :-
पौराणिक काल की बात है एक गांव में एक वृद्ध ब्राह्मण दम्पति रहते थे। उनके सात पुत्र और पुत्रवधु थी, किन्तु दुर्भाग्यवश सभी पुत्र नि:संतान थे। एक वृद्धा ने उस ब्राह्मणी को कहा कि वे अपने सभी पुत्रवधुओं सहित शीतला माता का षष्ठी व्रत करें। उस वृद्धा की बात मानकर ब्राह्मणी ने अपनी सभी पुत्रवधुओं सहित शीतला माता का षष्ठी व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसकी सभी पुत्रवधुओं को संतान का सुख प्राप्त हुआ। भूलवश एक बार ब्राह्मणी तथा उसकी बहुओं ने शीतला व्रत विधि के विपरित गर्म जल से स्नान कर लिया तथा आग जलाकर व्रत के दिन भोजन बनाकर भोजन कर लिया। इससे शीतला माता रुष्ठ हो गईं और उसी रात ब्राह्मणी ने भयानक स्वप्न देखा और उसकी आंख खुल गई। जाग्रित होने पर उसने देखा कि उसके परिवार के सभी सदस्य मृत हो चुके हैं।

यह देखकर ब्राह्मणी विलाप करने लगी। उसके विलाप को सुनकर पास पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने उस ब्राह्मणी को कहा कि यह सब शीतला माता का प्रकोप है क्योंकि तुमने शीताला षष्ठी के व्रत में गर्म जल से स्नान तथा गर्म भोजन कर व्रत भंग किया है। यह सुनकर वह रोती हुई घने वन की ओर जाने लगी। रास्ते में उसे एक बुढ़िया दिखाई पड़ी, वह बुढ़िया अग्नि की ज्वाला में तड़पते हुए देखा। 

बुढ़िया ने ब्राह्मणी से कहा कि इस जलन को दूर करने के लिए उसके शरीर पर दही का लेप करें। तब उस ब्राह्मणी ने कहीं से दही लाकर बुढ़िया के शरीर पर लगाया जिससे उस बुढ़िया की जलन समाप्त हो गई। तब उस ब्राह्मणी ने उस बुढ़िया रूपी माता से अपने भूल की क्षमा मांगी और अपने परिवार को पुन:जीवित करने की याचना की। शीतला माता उस ब्राह्मणी का पश्चाताप देखकर उससे कहा कि वह अपने घर जाए और परिवार के सभी सदस्य पर दही का लेप करे। ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। शीतला माता की कृपा से ब्राह्मणी के परिवार के सभी सदस्य जीवित हो गए। उस दिन से ही इस व्रत को संतान की प्राप्ति तथा दीर्घायु के लिए किया जाता है।

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