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शुक्र प्रदोष व्रत: जीवन से नकारात्मकता होगी समाप्त, जानें पूजा विधि

शुक्र प्रदोष व्रत: जीवन से नकारात्मकता होगी समाप्त, जानें पूजा विधि

डि​जिटल डेस्क। प्रदोष व्रत का अत्यंत धार्मिक महत्व है, वहीं शुक्रवार के दिन जो प्रदोष व्रत पड़ता है वो शुक्र प्रदोष या भुगुवारा प्रदोष व्रत कहलाता है, जो कि इस बार 31 मई 2019 को पड़ रहा है। इस दिन भगवान शंकर की पूजा की जाती है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि यानी प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन रखा जाता है। इस दिन भगवान शंकर की पूजा काफी फलदायी होती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि शुक्र प्रदोष व्रत को करने से जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है और सफलता मिलती है।

प्रदोष व्रत सामग्री
प्रदोष व्रत पर भगवान की पूजा के लिए सफेद पुष्प, सफेद मिठाइयां, सफेद चंदन, सफेद वस्त्र, जनेउ, जल से भरा हुआ कलश, धूप, दीप, घी,कपूर, बेल-पत्र, अक्षत, गुलाल, मदार के फूल, धतुरा, भांग, हवन सामग्री आदि, आम की लकड़ी की आवश्यकता होती है।

व्रत विधि
शुक्र प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिए। पूरे दिन मन ही मन “ॐ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिए। शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा संध्या काल 4:30 बजे से लेकर संध्या 7:00 बजे के बीच की जाती है।

संध्या काल में पुन: स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें।

ध्यान का स्वरूप- 
करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।

ध्यान के बाद, शुक्र प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनाएं। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें। उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें। उसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

कथा
स्कंद पुराण के अनुसार एक गांव में एक विधवा ब्राह्मणी अपने बच्चे के साथ रहकर भिक्षा से गुजारा करती थी। एक दिन उसे भिक्षा लेकर लौटते समय नदी किनारे एक बालक मिला। वह विदर्भ देश का राजुकमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता का राज्य हड़प लिया था और पिता की हत्या कर दी थी। उसकी माता की मृत्यु हो चुकी थी। ब्राह्मण महिला ने उसे अपना लिया। एक दिन ऋषि शांडिल्य ने उस ब्राह्मण महिला को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। प्रदोष व्रत के फलस्वरूप राजकुमार धर्मगुप्त का विवाह गंधर्व राज की कन्या से हुआ। जिनकी बदौलत उसने अपना खोया राज्य प्राप्त कर लिया और प्रदोष के माहात्म्य से सभी घोर कष्ट टल गए।

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