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अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी तक टाली सुनवाई, 2019 में तय होगी तारीख

BhaskarHindi.com | Last Modified - October 29th, 2018 22:54 IST

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News Highlights

  • SC में सोमवार से रामजन्‍मभूमि और बाबरी मस्‍जिद विवाद पर सुनवाई शुरू होने जा रही है।
  • चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच इस मामले में सुनवाई करेगी।
  • अयोध्या केस को आइटम नंबर 43 के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है।


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रामजन्मभूमि विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई को आगे बढ़ाने से सालों पुराना यह मामला एक बार फिर लटक गया है। सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि विवाद पर कुछ ही मिनट चली इस सुनवाई में कोर्ट ने इसकी अगली तारीख जनवरी, 2019 तक दी है। हालांकि अभी यह भी तय नहीं है कि अगर जनवरी में मामले की सुनवाई शुरू होती है तो मामले को नई बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजा ही जाएगा। अब जनवरी 2019 में ही इस बात का निर्णय होगा कि किस बेंच के सामने इस मामले की सुनवाई की जाएगी और किस तारीख को सुनवाई की जाएगी।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच इस मामले को जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया है। 27 सितंबर को जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस्लाम में मस्जिद की अनिवार्यता का सवाल संविधान पीठ के पास भेजने से मना कर दिया था। इस फैसले की वजह से ही अयोध्या मामले पर सुनवाई का रास्ता साफ हुआ है। इससे पहले पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और अब्दुल नज़ीर की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

निमोही अखाड़ा के महंत स्वामी परमहंस दास महाराज ने इस सुनवाई को लेकर कहा कि वे चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट जल्द से जल्द अपना फैसला सुनाए। उन्हें उम्मीद है कि इस बार कोर्ट अयोध्या मामले पर फैसला जरूर सुनाएगी। संतों ने 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मंदिर निर्माण न शुरू होने पर बीजेपी सरकार को अल्टिमेटम भी दिया है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने कहा कि अगर लोकसभा चुनाव से पहले मंदिर निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे अन्य विकल्प तलाशेंगे। वहीं मुस्लिम धर्मगुरु भी चाहते है कि इस मामले का जल्द से फैसला आ जाए।

अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अपना फैसला नहीं सुनाती है तो फिर लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर निर्माण के सरकार के पास दूसरे भी विकल्प है। फिलहाल सरकार तीन विकल्पों पर विचार कर रही है। या तो वह अध्यादेश लाकर राम मंदिर का निर्माण शुरू करा सकती है। दूसरा विकल्प है कि वह शीतकालीन सत्र में बिल लेकर आए। तीसरा विकल्प सरकार के पास ये है कि वह राम मंदिर को लेकर विशेष सत्र बुलाए।

क्या है पूरा विवाद
अयोध्या मामला इस देश का सबसे बड़ा विवाद है। जिस पर राजनीति भी होती रही है और सांप्रदायिक हिंसा भी भड़की है। हिंदू पक्ष ये दावा करता है कि अयोध्या का विवादित ढांचा भगवान राम की जन्मभूमि है और इस जगह पर पहले राम मंदिर हुआ करता था। जिसे बाबर के सेनापति मीर बांकी ने 1530 में तोड़कर यहां पर मस्जिद बना दी थी। तभी से हिंदू-मुस्लिम के बीच इस जगह को लेकर विवाद चलता रहा है। माना जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर के शासन में हिंदू भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया। मस्जिद बाबर ने बनवाई इसलिए इसे बाबरी मस्जिद कहा गया।

1853 में हिंदुओं ने आरोप लगाया कि राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई, इसके बाद दोनों के बीच हिंसा हुई। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने 1859 में आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग पूजा करने की इजाजत दे दी। 1885 में महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील की। 1949 में हिंदुओं ने भगवान राम की मूर्ति इस स्थल पर रखी और पूजा शुरू कर दी। गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद कोर्ट में सन 1950 को भगवान राम की पूजा की विशेष इजाजत मांगी। 5 दिसंबर, 1950 में महंत परमहंस रामचंद्र दास परिसर में हिंदू पूजा जारी रखने और राममूर्ति रखने के लिए याचिका दायर की। 9 साल बाद निर्मोही अखाड़ा ने, 1959 में स्थल हस्तांतरित करने की मांग कोर्ट से की। इस मामले पर यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में मस्जिद का मालिकाना हक लेने के लिए केस दायर किया।

इन मामलों की सुनवाई कर 1 फरवरी, 1986 फैजाबाद जिला जज ने हिदुओं को पूजा करने की इजाजत दे दी। स्थल पर लगे ताले खोल दिए गए। 9 नवंबर, 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दे दी। बीजेपी के सीनियर लीडर लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर, 1990 से सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली। 1991 में यूपी में बीजेपी की सरकार थी और सीएम थे कल्याण सिंह। सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने कब्जे में ले लिया।

1989 के बाद बढ़ा मामला
अयोध्या विवाद ने 1989 के बाद से तूल पकड़ा और 6 दिसंबर 1992 को हिंदू संगठनों ने अयोध्या में राम मंदिर की जगह बनी विवादित बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया। जिसके बाद ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 में इस विवाद पर फैसला सुनाया था। फैसले में कहा गया था कि विवादित जमीन को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाएगा, एक हिस्सा राम मंदिर के लिए, एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था। तीनों ही पक्षों ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसी साल मार्च में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुझाव दिया था कि इस पूरे विवाद को कोर्ट के बाहर बातचीत के जरिए भी सुलझाया जा सकता है। अगर जरूरत पड़ी तो वो इसमें मध्यस्थता करेंगे लेकिन कोई बात नहीं बनी। 

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