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नागपुर में बाल अपराधियों की संख्या 500 से अधिक, संगीन अपराधों में लिप्त मिले कई

BhaskarHindi.com | Last Modified - September 14th, 2018 15:23 IST

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नागपुर में बाल अपराधियों की संख्या 500 से अधिक, संगीन अपराधों में लिप्त मिले कई

डिजिटल डेस्क, नागपुर। देश में बाल अपराध (विधि संघर्षग्रस्त बालक) को रोकने के लिए भले ही बड़े दावे किए जा रहे हों। लेकिन सच्चाई यह है कि, पिछले तीन साल में संतरानगरी में 500 से अधिक बाल अपराधी कई अपराधों में यहां तक की हत्या जैसा अपराधों में लिप्त पाए गए। सूत्रों के अनुसार बाल अपराधियों के लिए विशेष बाल पुलिस दस्ता होना चाहिए, लेकिन नागपुर जिले में यह दस्ता ही नहीं है। थाने में तैनात बाल संरक्षण अधिकारी से काम चल रहा है। कई बाल संरक्षण पुलिस अधिकारियों का तबादला हो चुका है। ऐसे में इस मामले में संबंधित विभाग के अधिकारियों को ‘दुबले पर दो आषाढ़’ वाली स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। 

कई पर हैं गंभीर अपराध दर्ज
कहने को नागपुर में 30 थानों में 30 बाल संरक्षण पुलिस अधिकारी हैं, लेकिन सूत्रों के अनुसार 20 से अधिक पुलिस अधिकारियों के संबंधित थानों से तबादले हो चुके हैं। अब फिर नए अधिकारियों को प्रशिक्षित करना होगा। नियमानुसार नागपुर जिले में विशेष बाल पुलिस दस्ता गठित किया जाना चाहिए, लेकिन जिला महिला व बाल विकास विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली को तब ग्रहण लग जाता है। जब प्रशिक्षित पुलिस अधिकारी का तबादला कर दिया जाता है। विशेष बाल पुलिस दस्ता की जरूरत इसीलिए महसूस की जाने लगी है कि बाल संरक्षण पुलिस अधिकारी का जल्दी तबादला नहीं होगा। नागपुर के बाल निरीक्षण गृह में 15 बाल अारोपी हैं, इनमें कुछ गंभीर अपराधों में लिप्त हैं। 

यह होती है विशेषता
अधिकारियों का कहना है कि, नागपुर जिले में ही विशेष बाल पुलिस दस्ता नहीं है। इसे देश के दूसरे शहरों में विशेष किशोर पुलिस इकाई कहा जाता है। इस दस्ते में एक बाल कल्याण अधिकारी, दो स्वैच्छिक सामाजिक कार्यकर्ता, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक पुलिस अारक्षक, एक पुलिस अधिकारी एवं एक बाल मित्र परामर्शदाता रहता है। इस इकाई के पुलिस कर्मी सादे लिबास में रहते हैं, ताकि बाल आरोपियों के मन में कोई झिझक न हो। 

कुछ अधिकारियों को स्पेशल जुवेनाएल एक्ट की तक जानकारी नहीं
सूत्र बताते हैं कि कुछ पुलिस अधिकारियों को स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट अंडर जे जे एक्ट 2015 के बारे में तक जानकारी नहीं है। कहा यह भी गया था कि, हर थाने के बोर्ड पर बाल संरक्षण के नियम लिखे होंगे, जिससे हर किसी को इन बाल कल्याण समितियों के अधिकार पता चल सकें और इन बच्चों की बेहतर तरीके से देख-रेख हो सके। बाल संरक्षण योजना के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के संरक्षण एवं देखभाल लिए विशेष किशोर पुलिस इकाई होना बेहद जरूरी है। 

पुलिस की भूमिका
एक बाल आरोपी का किशोर न्याय व्यवस्था से पहला परिचय पुलिस के माध्यम से होता है। किशोर न्याय अधिनियम 2000 के तहत प्रत्येक जिले व शहर में एस.जे.पी.यू (स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट) की स्थापना होनी चाहिए। 24 घंटे के भीतर बाल आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। पूछताछ के दौरान, गवाहों को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश करना, पुलिस की जिम्मेदारी होती है। किशोर को विशेष गृह अथवा उसके घर तक पहुंचाना पुलिस की जिम्मेदारी है। पॉक्सो एक्ट-2012 के बारे में जानकारों ने बताया कि इसमें 46 धाराएं हैं और छह प्रकार के अपराध हैं। इस एक्ट में 7 से लेकर 10 साल तक आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। 

किशोर अपराध और कानून
भारत में, कानून के साथ संघर्ष में बच्चों के मामले में पहला विधान या बच्चों का अपराध करना प्रशिक्षु अधिनियम 1850 था। इसमें प्रावधान था कि 15 से कम आयु का बच्चा यदि छोटे अपराधों को करते हुए पाया गया तो एक प्रशिक्षु के रूप में बंधक बनाया जाएगा। इसके बाद, सुधार विद्यालय अधिनियम, 1897, प्रभाव में आया, जिसने ये प्रावधान किया कि 15 साल से अधिक आयु वाले बच्चों को दंड देकर जेल के सुधारगृह घर में भेजा जाएगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, देखभाल, सुरक्षा, विकास और उपेक्षित या अपराधी किशोरों के पुनर्वास प्रदान करने के लिये, हमारी संसद ने किशोर न्याय अधिनियम, 1986 को लागू किया गया। ये वो अधिनियम था जो देश में समान प्रणाली व्यवस्था को लाया था।

अधिनियम का भाग 2 (A) “किशोर” शब्द को “लड़का, जिसकी आयु 16 साल नहीं है और लड़की जिसकी आयु 18 साल नहीं है” के रूप में परिभाषित करता है। इसके बाद, संसद ने किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000, को लागू किया जिसमें लड़की और लड़को दोनों की आयु 18 साल कर दी।

वर्तमान विधान
किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम 2000, किशोर कानून के नीचे संघर्ष में हैं या किशोर अपराधियों को ‘अवलोकन-गृह’ में रखा जाये जबकि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान बच्चे को देखभाल या सुरक्षा की आवश्यकता हो तो उसे ‘बाल गृह’ में रखा जाये।

एक किशोर को उसके द्वारा किये गये अपराध की गंभीरता को देखते हुये अधिकतम 3 साल की अवधि के लिये हिरासत में लेकर सुधार घर में भेजा जा सकता है। किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 उस बच्चे के लिये प्रतिरक्षा प्रदान करता है जिसकी आयु अपराधिक न्यायालय या अन्य धारा 17 के मद्देनजर आपराधिक कानून के तहत अपराध के लिये नियुक्त किये गये कमीशन के सजा सुनाने के समय 18 साल से कम हो।

इस नये अधिनियम का उद्देश्य पुनर्वास और मुख्यधारा के समाज में उसे आत्मसात करना था। इसका तर्क ये था कि बच्चें को उसकी कच्ची आयु में ही थोड़े से प्रयासों के माध्यम से सुधारा जा सकता है और ये राज्य की जिम्मेदारी है कि वो बच्चों का संरक्षण और सुधार करे।

तो मिल सकती है समस्या से निजात
बाल व महिला विभाग के अधिकारी थाने में नियुक्त किए गए बाल संरक्षण पुलिस अधिकारी को बाकायदा प्रशिक्षित करता है, लेकिन उस पुलिस अधिकारी का तबादला होने पर फिर से वही परेशानी जिला महिला व बाल विकास विभाग के सामने आ जाती है। अगर विशेष बाल पुलिस दस्ता बन जाए तो इस समस्या से निजात मिल सकती है। 
(विजयसिंह परदेसी , जिला महिला व बाल विकास अधिकारी, नागपुर) 

हर थाने में बाल संरक्षण पुलिस अधिकारी 
शहर के प्रत्येक थाने में बाल संरक्षण अधिकारी नियुक्त है। वह जिला महिला व बाल विकास विभाग के साथ मिलकर कार्य करता है। 
(संभाजी कदम, उपायुक्त, अपराध शाखा पुलिस विभाग)

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