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VIDEO : जानिए, कब होती थी मुर्दे की ताजी राख से महाकाल बाबा की भस्मारती

BhaskarHindi.com | Last Modified - August 29th, 2018 17:35 IST

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डिजिटल डेस्क, उज्जैन। महाकाल बाबा की भस्मारती अब पिंडी पर सफेद कपड़ा लपटेकर होती है। क्षरण की बात सामने आने के बाद जांच कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीमकोर्ट ने प्रतिदिन भस्मारती सफेद कपड़ा लपेटकर करने के आदेश दिए। अब बाबा को भस्मारती के पहले पहले कपड़ा लपेटा जाता है फिर आगे की प्रकिया शुरू होती है। दो दिन पूर्व वैकुण्ठ चतुर्दशी पर बाबा सृष्टि का कार्यभार भगवान विष्णु को सौंपकर कैलाश की ओर निकले। आज यहां हम आपको बाबा महाकाल से जुड़ी कुछ ऐसी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे महाकाल की महिमा स्पष्ट होती है।

विशेष नियम

यहां पहले श्मशान हुआ करता था। दुनिया भर में यह एक मात्र मंदिर है जहां बाबा की भस्मारती होती है। इस दौरान गर्भग्रह में जाने के विशेष नियम हैं। जिनका पालन करने के बाद ही भस्मारती को देखा जा सकता है। 

गोबर के उपलों से बनी राख 

भस्मारती पहले चिता की राख से होती थी। अब अनेक वर्षों से गोबर के उपलों से बनी राख से होती है। बाबा भूतभावन हैं इसलिए यही उनका श्रंगार है। यह परंपरा कब शुरू हुई यह कोई अब तक नहीं बता पाता। हालांकि ऐसा माना जाता है कि मुगलकालीन शासन में चिता की राख से भस्मारती की परंपरा थी। 

पुजारी ने जीवित पुत्र की जलायी चिता 

बाबा की भस्मारती को लेकर कहा जाता है कि एक बार बाबा के श्रंगार के लिए किसी मुर्दे की राख नही मिली। जैसे उस दिन महाकाल की आरती के लिए काल ने किसी को अपना ग्रास नहीं बनाया था। बाबा के अनन्य भक्त और पुजारी ने परंपरा और महाकाल के श्रंगार के अपने जीवित पुत्र को अग्नि के सुपुर्द किया और उसकी चिता की राख से महाकाल की भस्मारती की। ऐसा भी कहा जाता है कि इसके बाद ही मुर्दे की राख से भस्मारती की प्रथा समाप्त हुई। ऐसी कहानी यहां प्रचलित है इसमें कितनी सत्यता है ये कोई नही बता सकता। 

कुंभ से पूर्व जारी निर्माणकार्य के दौरान यहां कुछ हड्डियां जमीन के अंदर से मिलीं। जिसके बाद लोग कुछ वक्त के लिए डरे, लेकिन जब यह बताया गया कि यहां पहले पूर्णतः श्मशान था तो इसे सामान्य माना गया। 
 

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