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वीरप्पन : कटे हुए सिर से फुटबॉल खेली थी, बचने के लिए अपनी बेटी तक को मार दिया था

August 30th, 2018 15:21 IST

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 18 अक्टूबर 2004 का दिन। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का फोन बजा। सामने थे आईपीएस अधिकारी के विजय कुमार। विजय कुमार ने जयललिता से कहा 'मैम, वी हेव गॉट हिम'। विजय कुमार का इतना कहना था और जयललिता ने कहा- 'मुख्यमंत्री रहते हुए मुझे इससे अच्छी खबर नहीं मिल सकती।' दरअसल, विजय कुमार जयललिता को वीरप्पन की मौत की खबर दे रहे थे। ये वही वीरप्पन था, जिसपर 2000 से ज्यादा हाथियों और 184 लोगों को मारने का आरोप था। वीरप्पन ने न सिर्फ तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार की नींद उड़ाई थी, बल्कि भारत सरकार की नींद भी हराम कर दी थी। वीरप्पन पर करोड़ों रुपए का इनाम था, लेकिन उसका खौफ इतना था कि कोई भी उसके बारे में नहीं बताता था। आज उसी वीरप्पन का जन्मदिन है। वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को गोपीनाथन गांव में हुआ था। वीरप्पन का जन्म तो सामान्य से चरवाहे परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में वो भारत का सबसे कुख्यात डाकू बन गया था। आज हम उसी वीरप्पन के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

17 साल की उम्र में हाथी का शिकार

वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को गोपीनाथम गांव में हुआ था और उसका असली नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पा गौड़न था। वीरप्पन का जन्म तो एक चरवाहे परिवार में हुआ था, लेकिन 16-17 साल की उम्र में ही वो अवैध शिकार करने वाले गिरोह में जुड़ गया। इसके बाद वीरप्पन ने सिर्फ 17 साल की उम्र में पहली बार हाथी का शिकार किया था। वीरप्पन के बारे में कहा जाता है कि हाथियों का शिकार करने की उसकी अपनी टेकनीक होती थी। वो हाथी के माथे के बीचों-बीच गोली मारता था, जिससे हाथी की तुरंत मौत हो जाती थी। इसके बाद से वीरप्पन हाथियों का शिकार करने लगा और उनके दांतों की तस्करी भी। कहा जाता है कि वीरप्पन ने हाथी दांत की तस्करी कर खूब पैसा कमाया था और पूरे जंगल में उसका कारोबार था।

जब वीरप्पन ने धमाके से मार डाला था 21 लोगों को

ये वो वक्त था जब वीरप्पन नया-नया आया था और उससे पहले तमिलनाडु में एक जंगल पेट्रोल पुलिस होती थी, जो जंगल में होने वाली तस्करी को रोकने का काम करती थी। इस पेट्रोल पुलिस के चीफ थे लहीम शहीम गोपालकृष्णन, जिन्हें रैंबो के नाम से भी जाना जाता था। अप्रैल 1993 में रैंबो को वीरप्पन ने एक बैनर के जरिए भद्दी-भद्दी गालियां दी। इस सबके बाद रैंबो इतने नाराज हुए कि उन्होंने तुरंत वीरप्पन को पकड़ने का फैसला कर लिया। रैंबो पहले जीप से जा रहे थे, लेकिन रास्ते में उनकी जीप खराब हो गई और वो पुलिस बस में बैठ गए। वीरप्पन को इस बात का अंदाजा था कि रैंबो उसे पकड़ने जरूर आएंगे, लिहाजा वीरप्पन ने पहले से ही इंतजाम कर रखा था। वीरप्पन दूर से ही नजरें गड़ाए बैठा था। जब उसने बस में रैंबो को पहली सीट पर बैठे देखा तो अपनी गैंग को सीटी बजाकर इशारा किया। तभी गैंग के एक सदस्य ने बारूदी सुरंगों से जुड़ी हुई 12 बोल्ट कार की बैट्री के तार जोड़ दिए। इसके बाद इतनी जोर का धमाका हुआ कि वीरप्पन भी चौंक गया। करीब 3000 डिग्री सेल्सियस का तापमान पैदा हुआ और पूरी बस हवा में उछल गई। बस में बैठे सभी 21 लोगों के मांस के टुकड़े और शव नीचे गिरने लगे। इस घटना ने वीरप्पन का खौफ पूरे देश में फैला दिया। वीरप्पन को भी इसी बात का इंतजार था।

कटे सिर के साथ फुटबॉल खेली थी वीरप्पन ने

एक वन अधिकारी जिनका नाम पी श्रीनिवासन था, उन्होंने वीरप्पन को गिरफ्तार किया, लेकिन वो उनकी गिरफ्त से निकल गया। इसके बाद श्रीनिवासन, वीरप्पन के छोटे भाई अर्जुनन के साथ लगातार संपर्क में थे और अर्जुनन ने श्रीनिवासन को कहा कि वीरप्पन सरेंडर करने वाला है। इसके बाद श्रीनिवासन और अर्जुनन जब वीरप्पन के पास पहुंचे, तो सामने हाथ में राइफल लेकर खड़े वीरप्पन ने श्रीनिवासन पर फायरिंग कर दी। इसके बाद उनका सिर काटा और अपने घर ले गया। वीरप्पन इतना खूंखार था कि उसने श्रीनिवासन के सिर से अपने साथियों के साथ फुटबॉल खेली।

बचने के लिए अपनी बेटी को मार डाला

अगर कोई डाकू है, तो उससे आप क्रूरता और खूंखारियत के अलावा और क्या उम्मीद कर सकते हैं। आपने कई डाकुओं की क्रूरता की कहानियों सुनी होगी, लेकिन ये ऐसी बात थी, जो सच्ची थी। 1993 में ही वीरप्पन को एक लड़की हुई। वीरप्पन जंगलों में रहता था और बच्ची के रोने की वजह से वो एक बार पकड़ाते हुए बचा था। रात के अंधेरे में जब वीरप्पन की बच्ची रोती थी, तो उसकी आवाज 2-4 किलोमीटर दूर तक सुनाई देती थी। एक दिन उसकी बच्ची रो रही थी और फिर वीरप्पन ने उस बच्ची की आवाज को हमेशा के लिए दबाने का फैसला किया। थोड़े दिनों बाद कर्नाटक एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) को मारी माडुवू में एक बच्ची का शव मिला और ये बच्ची वीरप्पन की बेटी थी।

फिर शुरू हुआ वीरप्पन को पकड़ने का प्लान

वीरप्पन की क्रूरता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। उसके ऊपर करोड़ों रुपए का इनाम था और कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल समेत भारत सरकार तक उससे परेशान थी। इसके बाद जून 2001 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने सीनियर आईपीएस अधिकारी के विजय कुमार को एसटीएफ का चीफ बनाया। के विजय कुमार को राज्य में बढ़ रही चंदन तस्करी और वीरप्पन को खत्म करने का आदेश था। के विजय कुमार ने वीरप्पन को पकड़ने का प्लान बनाया और उसके बारे में सारी जानकारियां जुटाई। के विजय कुमार को पता चला कि विजय कुमार को कम दिखाई देता था। फिर विजय कुमार ने प्लान बनाया कि वीरप्पन को मारना है, तो उसे जंगल से बाहर निकालना ही होगा।

मूंछें ट्रिम कर बैठ गया एंबुलेंस में

वीरप्पन ये बात अच्छे से जानता था कि वो अगर जंगल से बाहर निकला, तो वो मारा जाएगा। एक दिन विजय कुमार को जानकारी मिली कि वीरप्पन अपनी आंखों के इलाज के लिए जंगल से बाहर जा रहा है। इसके बाद प्लान के तहत एसटीएफ ने एक एंबुलेंस भेजी, जिसपर सलेम हॉस्पिटल लिखा था। पुलिस को धोखा देने के लिए वीरप्पन ने अपनी मूंछें ट्रिम कर ली और एंबुलेंस में सवार हो गया। वीरप्पन के साथ उसके कुछ साथी भी थे। एंबुलेंस में उस वक्त एसटीएफ के एक इंस्पेक्टर और ड्राइवर मौजूद थे।

कुछ इस तरह हुआ एनकाउंटर

बताया जाता है कि जब वीरप्पन के हॉस्पिटल जाने वाले रास्ते पर एसटीएफ पहले से ही तैनात थी। एसटीएफ ने एक ट्रक रास्ते में अड़ा दिया, जिसमें एसटीएफ के 22 जवान मौजूद थे। ट्रक देखकर जैसे ही एंबुलेंस रुकी, तो पुलिस ने पहले वीरप्पन को सरेंडर करने को कहा। पुलिस की वॉर्निंग के बाद भी जब वीरप्पन ने सरेंडर नहीं किया, तो ड्राइवर और एसटीएफ का जवान जो एंबुलेंस में मौजूद थे, वो नीचे उतर गए। फिर एसटीएफ ने एंबुलेंस पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाब में वीरप्पन की तरफ से भी फायरिंग हुई। इस फायरिंग में वीरप्पन को सिर्फ 2 गोलियां ही लगी थी, लेकिन उसकी मौत हो गई। बाद में उसके साथी भी एनकाउंटर में मारे गए। वीरप्पन के मारे जाने के बाद जब इसकी जानकारी जयललिता को मिली, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने विजय कुमार से कहा कि 'मेरे मुख्यमंत्री रहते हुए मुझे इससे ज्यादा खुशी की खबर नहीं मिल सकती।'

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