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क्या होता है मांगलिक दोष, जानें मान्यता और भ्रांतियां

क्या होता है मांगलिक दोष, जानें मान्यता और भ्रांतियां

डिजिटल डेस्क। प्राचीन काल से ही विवाह के पूर्व कुंडली मिलान किया जाता रहा है। वर और वधु की जन्म कुंडली के आधार पर उनका विवाह होना योग्य हैं या नहीं, इसे कुंडली मिलान में देखा जाता है। कुंडली मिलान में कई बातें देखी जाती हैं उसमें सबसे ज्यादा मान्यता होती हैं मंगल की। बायोडाटा बनाने के पहले पंडितजी से पूछा जाता है वर या कन्या मांगलिक है या नहीं। नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन अगर मांगलिक है तब माता-पिता के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखलाई देने लगती हैं।

सनातन काल से ही मंगल को लेकर एक ‘‘हव्वा’’ बना कर रखा है। मांगलिक को मांगलिक ही जीवनसाथी चाहिए अन्यथा अलग अलग कुतर्क दिए जाते हैं। दोनों में से एक का जीवन संकट में पड़ जाएगा, संतान नहीं होगी, आल्पायु होंगे आदि आदि। मांगलिक होना उनकी दृष्टि में बहुत बडा दोष हैं।

मांगलिक होने से विवाह में देरी होगी, वैवाहिक जीवन उतार चढ़ाव से भरा रहेगा आदि अनेको भ्रांतियां दिलों दिमाग में घर कर जाती हैं। ऐसी कई बातें ‘‘ मांगलिक होने ’’ से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में bhaskarhindi.com पर पंडित सुदर्शन शर्मा शास्त्री बता रहे हैं, मांगलिक और उससे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के उपाए...

मांगलिक कितने प्रतिशत ?
आम धारणा ये है कि मांगलिक बहुत कम होते हैं, परंतु ये गलत धारणा है। ज्योतिष के अनुसार ‘‘लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे ! कन्यां भर्तु विनाशः स्यात् पुंसां भार्या विनश्यति !! अर्थात् जिन जातक की कुंडली में  प्रथम, चतुर्थ, सप्तम,अष्टम  तथा द्वादश इन भावों पर मंगल होने पर वो अशुभ होता है या साधारण भाषा में उसे मांगलिक कहते हैं।

हर दिन 24 घंटे होते हैं, प्रत्येक लग्न लगभग 2 घंटे का होता है। इस प्रकार 24 घंटे में लगभग 12 लग्न होते हैं। पहले, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवे मंगल होने से उसे मांगलिक कहेंगे। इस प्रकार 12 लग्न में से 5 लग्न वाले पूर्ण रूप से मांगलिक होते हैं। यदि प्रतिशत की बात करें तो 41. 67 प्रतिशत प्रतिदिन मांगलिक उत्पन्न हो रहें हैं। साधारण भाषा में बात करें तो प्रतिदिन 12 लोग उत्पन्न हो रहें हैं उसमें से 5 मांगलिक हैं। इसलिए मांगलिक होने से घबराने की कोई बात नहीं हैं। 

मांगलिक का विवाह मांगलिक के साथ ही होना चाहिए ?
मांगलिक का विवाह मांगलिक के साथ ही होना आवश्यक नहीं है। मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में प्रतिकुल परिणाम आमतौर पर देता है। इसलिए मंगल के सदृश्य दूसरी कुंडली में इन्हीं स्थानों पर मंगल हो तो अच्छा होता है। इसे मांगलिक का मांगलिक से मिलान कहते हैं।

इसके अलावा एक कुंडली में इन स्थानों में से किसी स्थान पर मंगल हैं और दूसरी कुंडली में मंगल नहीं हैं तब दूसरी कुंडली में इन्हीं स्थानों में से किसी स्थान पर यदि शनि या राहू, केतु तथा सूर्य में से कोई भी एक ग्रह यदि है तब भी उससे मांगलिक कुंडली का मिलान हो सकता है। इसके अलावा चंद्र कुंडली से भी मांगलिक हो तो भी वह मांगलिक माना जाता है।

क्या हैं पगड़ी मंगल तथा चुनरी मंगल ?
मांगलिक के संदर्भ में पगड़ी मंगल तथा चुनरी मंगल ये दो शब्द सुनने को मिलते हैं। पूछते हैं मंगल कौन सा है, पगड़ी मंगल या चुनरी मंगल। आमजन तो असमंजस में पड़ते ही हैं नए ज्योतिषी भी ये शब्द सुनकर दुविधा में पड़ जाते हैं कि ये क्या बला हैं कोई ग्रंथ में तो ये सुनने के लिए नहीं मिला। पहले लड़के आमतौर पर पगड़ी पहनते थे और लड़कियां चुनरी ओढ़ा करती थीं। इसलिए यदि लड़के की कुंडली मांगलिक है तब उसे पगड़ी मंगल कहा जाता हैं और यदि लड़की की कुंडली मांगलिक हैं तब उसे चुनरी मंगल कहा जाता है।

क्या 28 वर्ष के बाद मंगलदोष दूर हो जाता है?
कुछ लोगों में यह भी भ्रम है कि आयु के 28 वर्ष के बाद वह कुंडली मांगलिक नहीं होती। ये पुरी तरह से निराधार है। साधारण तौर पर यदि कुंडली मे मंगल दोष हैं तब विवाह 28 वर्ष तक नहीं होने देता, कुछ शुभता उसमें हैं तब 24 वें वर्ष में विवाह करवा देता है, परंतु आमतौर पर 28 वर्ष तक विवाह नहीं होता। 28 वर्ष के बाद कुंडली में मंगल का प्रभाव तो रहेगा ही, हां कुछ हद तक उसका कुप्रभाव कम हो जाता है। 

मंगल दोष के अपवाद 
1.
एक कुंडली मांगलिक हैं तथा दुसरी कुंडली में चंद्र कुंडली में मंगल 1,4,7,8 तथा 12वें स्थान पर हो तो भी उसे चंद्र मांगलिक माना जाता है और विवाह के योग्य होता है।
2. एक कुंडली में मंगल हैं तथा दुसरी कुंडली में 1,4,7,8 तथा 12 वें स्थान पर शनि, राहू, केतु, सूर्य इनमें से कोई एक ग्रह हो तब भी वह मंगल के सदृश्य माना जाता है। 
3. यदि मेष राशि का मंगल लग्न में, वृश्चिक राशि का मंगल चतुर्थ में, मकर राशि का मंगल सप्तम में, कर्क राशि का मंगल अष्टम में तथा धनु राशि का मंगल द्वादश भाव में, मीन राशि का मंगल सप्तम भाव में तथा कुंभ राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो उसमें मंगलदोष बुरा नहीं माना जाता।
4. एक कुंडली मांगलिक है तथा दूसरी कुंडली मांगलिक नहीं हैं, लेकिन दूसरी कुंडली में , पहली मांगलिक कुंडली का सप्तमेश, 6वें, 8वें अथवा 12वें स्थान पर हो तो मंगलदोष समाप्त करता हैं।
5. मंगल यदि कुंडली में वक्री हो, अस्त हो तब उसका दोष नहीं होता।  
6. मंगल यदि कुंडली में नीच राशि का यानि कर्क राशि में हो, अथवा मिथुन या कन्या राशि जो की शत्रुराशि हैं इसमें हो तब भी उसका दोष नहीं रहता। 
7. मंगल यदि बलवान हैं या गुरू अथवा शुक्र या चंद्रमा ये स्वराशि में होकर मंगल के साथ युति कर रहे हो या मंगल की दृष्टि में हो तब भी मंगलदोष नहीं लगता। 
8. मंगल मकर लग्न में तथा सप्तम मे चंद्रमा कर्क हो तो मंगलदोष दूर करता है।
9. चंद्र मंगल की युति इन स्थानों पर किसी भी स्थान पर हो रही हो तो भी मंगल का परिहार होता है। 
10. मंगल जिस अरिष्ट स्थान पर है उस स्थान का अधिपति यदि केद्र स्थान 1, 4, 7, 10 या त्रिकोण 5, 9 में हो तब भी मंगल दोष दूर होता है।

इसके अलावा भी मंगल दोष के अनेको परिहार हैं। लोगों में एक और बड़ी गलतफहमी रहती है कि मांगलिक की कुंडली मांगलिक के साथ मिल ही जाती है। जबकि ऐसा जरूरी नहीं है। मांगलिक होना अलग बात है और कुंडली मिलना ये अलग विषय हैं। मांगलिक पत्रिका का मिलान मांगलिक के साथ तो मिलान होता ही है पर इसके साथ साथ किसी भी बिना मांगलिक पत्रिका के साथ भी मांगलिक पत्रिका का मिलान हो सकता है। वो भी शास्त्रोक्त रिती से।

कुछ सर्वसाधारण उपाय
यदि मांगलिक कुंडली हैं और मंगल दोषदायी हैं तब इन उपायो को करें...
- मंगलवार का व्रत करें, उस दिन नमक का सेवन न करें, शाम के समय कुंकुंम का त्रिकोण थाली मे बनाये और उसे लाल चंदन, लाल पुष्प अर्पित करें, धूप दीप तथा नैवेद्य समर्पित करें इसके बाद गेहूं की रोटी, घी तथा गुड का भोजन करें।  
- अं अंगारकाय नमः  का जप हर मंगलवार को करें 
- मंगलदोष प्रबल है तब मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ करें, पुर्वाभिमुख बैठकर पंचमुखी दीप प्रज्वलित कर अपने इष्ट का तथा मंगल ग्रह का पूजन कर जप करें 
  रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचंडिके ! हारिके विपदां राशे हर्षमंगलकारिके !! 
  हर्ष मंगलदक्षे च हर्ष मंगलदायिके ! शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगलचंडिके !! 
  मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले ! सदा मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये !! 
इस प्रकार वर तथा कन्या मांगलिक होने पर कुंडली मिलाकर विवाह करना योग्य होता है।

साभार - पंडित सुदर्शन शर्मा शास्त्री, अकोला 
            

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