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तलाक के लिए दी गई सहमति वापस लेने वाली महिला को नहीं मिली राहत

तलाक के लिए दी गई सहमति वापस लेने वाली महिला को नहीं मिली राहत

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने समझौते के तहत तय की गई रकम में से आधे से अधिक रकम लेने के बाद आपसी रजामंदी से तलाक के लिए दी गई सहमति को वापस लेनेवाली महिला को राहत देने से इंकार कर दिया है। मामले से जुड़े दंपति का विवाह 28 मार्च 2010 को हुआ था। साल 2012 से वे एक दूसरे अलग हो गए। इसके बाद दोनों ने अपासी सहमति के तहत अपना विवाह खत्म करने का निर्णय लिया। तलाक के लिए हुए समझौते के तहत  पति ने अपनी पत्नी को 11 लाख रुपए देना तय किया। फिर दोनों ने आपसी रजामंदी के तहत कोल्हापुर की पारिवारिक न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दायर किया। इससे पहले पति ने समझौते के तहत पत्नी को पहले ही आठ लाख रुपए दे दिए। 

पारिवारिक अदालत में जब मामला सुनवाई के लिए आया तो पत्नी ने तलाक के लिए दी गई सहमति को वापस ले लिया। इस पर पारिवारिक न्यायालय ने समझौते की शर्तों के तहत कहा कि वह पति की ओर से दी गई आठ लाख रुपए की रकम को वापस करे। इसके बाद हम उसकी अपात्तियों को सुनेगे। लेकिन पत्नी ने ऐसा नहीं किया। और पति ने समझौते के तहत शेष बची 3 लाख रुपए की रकम को पारिवारिक अदालत में जमा कर दिया। इसके मद्देनजर पारिवारिक न्यायालय ने सितंबर 2016 को दंपत्ति के विवाह को समाप्त कर दिया।

निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। न्यायमूर्ति अकिल कुरेशी व न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में महिला ने दावा किया कि उसने अपनी सास व ननद के दबाव व  अनुचित प्रभाव में आकर विवाह खत्म करने की सहमति दी थी। इसलिए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया जाए। मामले से जुड़े तथ्यों पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने पाया कि पारिवारिक अदालत में जब आपसी सहमति के तहत तलाक के लिए आवेदन दायर किया गया था उस समय महिला अपने पति से अलग रह रही थी। इसलिए सास व ननद के दबाव का सवाल ही नहीं पैदा होता है।

इसके अलावा पारिवारिक अदालत ने भी महिला को पति से लिए हुए आठ लाख रुपए जमा करने का निर्देेश दिया था लेकिन महिला ने वह रकम कोर्ट में नहीं जमा की। इसलिए हमे प्रकरण को लेकर पारिवारिक अदालत की ओर से दिए गए आदेश में कोई खामी नजर नहीं आती है। यह कहते हुए खंडपीठ ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया। और कहा कि वह पारिवारिक अदालत में समझौते के तहत जमा किए गए शेषतीन लाख रुपए निकालने के लिए स्वतंत्र है। इस तरह से खंडपीठ ने महिला को कोई राहत नहीं प्रदान की। 

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