बिष्णुपुर का सियासी गणित लोकसभा में भाजपा की मामूली बढ़त, विधानसभा में बदल जाते हैं समीकरण

बिष्णुपुर का सियासी गणित लोकसभा में भाजपा की मामूली बढ़त, विधानसभा में बदल जाते हैं समीकरण
पश्चिम बंगाल की बिष्णुपुर निर्वाचन क्षेत्र संख्या 37 वह भूमि है, जिसे कभी मल्ल राजाओं ने अपनी वीरता और कला प्रेम से सींचा था। आज, यही बिष्णुपुर अपनी ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक नया इतिहास लिख रहा है।

कोलकाता, 11 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल की बिष्णुपुर निर्वाचन क्षेत्र संख्या 37 वह भूमि है, जिसे कभी मल्ल राजाओं ने अपनी वीरता और कला प्रेम से सींचा था। आज, यही बिष्णुपुर अपनी ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक नया इतिहास लिख रहा है।

बिष्णुपुर का जिक्र होते ही आंखों के सामने 17वीं सदी के वे भव्य टेराकोटा मंदिर घूमने लगते हैं, जो मल्ल राजवंश की शान हुआ करते थे। रासमंच, श्याम राय, और मदन मोहन मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां महज कला नहीं, बल्कि मिट्टी में लिखी गई 'जीवंत इतिहास की किताबें' हैं। यहां का 'बांकुड़ा घोड़ा' आज भारतीय हस्तशिल्प का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।

बिष्णुपुर लोकसभा क्षेत्र सात विधानसभा सीटों का एक अनूठा संगम है। 2008 के परिसीमन के बाद इसकी सीमाओं में बदलाव हुआ, लेकिन इसकी आत्मा वही रही।

बरजोरा क्षेत्र बिष्णुपुर का 'औद्योगिक प्रवेश द्वार' है। यहां खेती के साथ-साथ उद्योगों का मेल दिखता है। मेजिया पावर प्लांट की निकटता और छोटे उद्योगों के कारण यहां का मतदाता आर्थिक नीतियों के प्रति काफी सजग रहता है। इस सीट से टीएमसी के आलोक मुखर्जी मौजूदा विधायक हैं।

ओंदा क्षेत्र पूरी तरह से कृषि प्रधान है। यहां की राजनीति सिंचाई के मुद्दों और आलू व धान की कीमतों के इर्द-गिर्द घूमती है। यहां का ग्रामीण मतदाता चुनाव की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। इस सीट से भाजपा के अमरनाथ शाखा विधायक हैं।

बिष्णुपुर सीट इस लोकसभा का 'सांस्कृतिक हृदय' है। पर्यटन, टेराकोटा कला और बालूचरी बुनकरों का सबसे बड़ा केंद्र यही है। यहां के शहरी और अर्ध-शहरी मतदाता विरासत के संरक्षण और पर्यटन विकास की उम्मीद रखते हैं। इस सीट से टीएमसी के तन्मय घोष विधायक हैं।

कोतुलपुर (एससी) आरक्षित सीट ऐतिहासिक रूप से कृषि और लघु उद्योगों का केंद्र रही है। यहां 'राढ़' क्षेत्र की परंपराएं काफी गहरी हैं। यहां की राजनीति में अनुसूचित जाति के समुदायों की आवाज सबसे ऊपर होती है। इस सीट से भाजपा के हरकाली प्रतिहार विधायक हैं।

इंडस (एससी) क्षेत्र को इसकी ऐतिहासिक जड़ों के लिए जाना जाता है। परिसीमन से पहले भी यह बिष्णुपुर लोकसभा का हिस्सा था। यहां की मिट्टी उपजाऊ है, लेकिन सिंचाई का संकट यहां के किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा है। इस सीट से भाजपा के निर्मल कुमार धारा विधायक हैं।

सोनामुखी (एससी) अपनी प्राचीन नगरपालिका और धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहां रेशम की बुनाई का काम बड़े पैमाने पर होता है। यह क्षेत्र सांस्कृतिक और व्यावसायिक रूप से बिष्णुपुर का छोटा रूप माना जाता है। इस सीट से भाजपा के दिबाकर घरामी विधायक हैं।

खंडघोष (एससी) एकमात्र सीट है जो पूर्व बर्धमान जिले में आती है। इसे बिष्णुपुर लोकसभा का 'अन्न भंडार' कहा जा सकता है। दामोदर नदी के किनारे होने के कारण यहां धान की खेती प्रचुर मात्रा में होती है, जिससे यहां की आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताएं अन्य सीटों से थोड़ी अलग हैं। इस सीट से टीएमसी के नबीन चंद्र बाग विधायक हैं।

परिसीमन से पहले तालडांगरा, रायपुर (एसटी), रानीबांध (एसटी) और इंदपुर (एससी) जैसी सीटें इस क्षेत्र की पहचान हुआ करती थीं, जो आज बांकुड़ा लोकसभा का हिस्सा हैं। वे सीटें मुख्य रूप से 'जंगल महल' की जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती थीं।

बिष्णुपुर संसदीय क्षेत्र की राजनीति किसी रोमांचक थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनावों में यहां की लड़ाई विचारधारा के साथ-साथ व्यक्तिगत भी थी। एक तरफ भाजपा के निवर्तमान सांसद सौमित्र खान थे, तो दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने उनकी पूर्व पत्नी सुजाता मंडल को मैदान में उतारा।

यह मुकाबला कितना कांटे का था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सौमित्र खान की जीत का अंतर मात्र 5,567 वोट रहा। यह 2024 के सबसे करीबी चुनावी नतीजों में से एक था।

बिष्णुपुर की दूसरी पहचान बालूचरी रेशम है। इसे जीआई टैग तो मिल गया, लेकिन इसके पीछे का सच कड़वा है। बाजार में जो साड़ी 20,000 रुपए में बिकती है, उसे बनाने वाले बुनकर को कई दिनों की मेहनत के बाद औसतन मात्र 300 रुपए की दिहाड़ी मिलती है। बिचौलियों के बढ़ते प्रभाव और सहकारी समितियों के पतन ने यहां के पारंपरिक बुनकरों को 'मजदूर' बना दिया है, जिससे युवा पीढ़ी इस पुश्तैनी काम से किनारा कर रही है।

हालांकि, तारकेश्वर-बिष्णुपुर रेलवे कॉरिडोर का काम अपने अंतिम चरण में है। इसके पूरा होने से कोलकाता से बिष्णुपुर की दूरी कम हो जाएगी और पर्यटन के नए द्वार खुलेंगे।

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Created On :   11 March 2026 11:24 PM IST

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