'दिल ढूंढता है फिर वही...', हर गुजरते साल के साथ भूपिंदर सिंह की अमिट यादें
नई दिल्ली, 17 जुलाई (आईएएनएस)। हर गुजरते साल के साथ कुछ आवाजें और भी गहरी होती चली जाती हैं। सिनेमा जगत के ऐसे ही विलक्षण पार्श्वगायक और गजल गायक भूपिंदर सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस दौर को याद करने जैसा है जिसने सुर, शब्द और एहसास को जीना सिखाया। आत्मा तक उतर जाने वाली आवाज से उन्होंने फिल्म संगीत और गजलों की दुनिया में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, जो आज भी श्रोताओं के दिलों में उसी ताजगी के साथ मौजूद है।
भूपिंदर सिंह का जन्म 6 फरवरी, 1940 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके पिता प्रोफेसर नत्था सिंह एक अच्छे संगीतकार थे और उन्होंने ही भूपिंदर सिंह को संगीत की शिक्षा दी। हालांकि पिता की सख्तमिजाजी के कारण शुरुआती दिनों में भूपिंदर सिंह का संगीत से मन उचट गया था, लेकिन उनकी प्रतिभा ने जल्द ही उन्हें उसी दुनिया का चमकता सितारा बना दिया। उनके संगीत सफर की शुरुआत दिल्ली स्थित ऑल इंडिया रेडियो से गायक और संगीतकार के रूप में हुई। उनकी गजलें पहले आकाशवाणी पर प्रसारित हुईं और फिर दिल्ली दूरदर्शन तक पहुंचीं। इसी दौरान ऑल इंडिया रेडियो की एक पार्टी और एक संगीत समारोह में संगीतकार मदन मोहन की नजर उन पर पड़ी। उनकी आवाज से प्रभावित होकर मदन मोहन ने उन्हें मुंबई बुलाया और यहीं से हिंदी फिल्म संगीत में उनके सुनहरे सफर की शुरुआत हुई।
भूपिंदर सिंह ने साल 1964 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म 'हकीकत' से बॉलीवुड में पार्श्वगायन की शुरुआत की। इस फिल्म में उन्होंने मोहम्मद रफी, तलत महमूद और मन्ना डे के साथ मदन मोहन द्वारा रचित अमर गीत 'होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा' गाया। इसके दो वर्ष बाद उन्हें फिल्म 'आखिरी खत' में खय्याम के संगीत निर्देशन में अपना पहला एकल गीत 'रुत जवान जवान रात मेहरबान' गाने का अवसर मिला। करीब पांच दशकों तक फैले अपने शानदार करियर में भूपिंदर सिंह ने संगीत जगत के लगभग सभी बड़े नामों के साथ काम किया। उन्होंने मोहम्मद रफी, आरडी बर्मन, मदन मोहन, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गुलजार और बप्पी लाहिड़ी जैसे दिग्गजों के साथ अपनी कला का जादू बिखेरा। उनकी आवाज ने हर दौर के संगीत प्रेमियों को अपना मुरीद बनाया।
भूपिंदर सिंह की पहचान सिर्फ एक पार्श्वगायक के रूप में ही नहीं रही, वे एक कुशल गिटारवादक भी थे। उन्होंने 'दम मारो दम', 'चुरा लिया है', 'चिंगारी कोई भड़के' और 'महबूबा ओ महबूबा' जैसे लोकप्रिय गीतों में गिटार बजाकर अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी का दायरा बेहद व्यापक था। 'दिल ढूंढता है फिर वही', 'नाम गुम जाएगा', 'प्यार हमें किस मोड़ पे', 'हुजूर इस कदर', 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी, 'थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान', 'शमा जलाए रखना' और 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता' जैसे गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं। उनके गाए 'मेरा रंग दे बसंती चोला' और 'दिल ढूंढता है फिर वही, फुरसत के रात दिन' जैसे गीतों ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई।
लेखक और फिल्मकार गुलजार भी उनकी आवाज के मुरीद थे। उन्होंने एक बार कहा था कि 'भूपिंदर की आवाज किसी पहाड़ी से टकराने वाली बारिश की बूंदों की तरह है। उनकी मखमली आवाज आत्मा तक सीधे पहुंचती है।' यह टिप्पणी उनकी गायकी की गहराई और संवेदनशीलता को बखूबी बयान करती है।
भूपिंदर सिंह के निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने 1980 के दशक में गायिका मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) से विवाह किया। एक कार्यक्रम में मिताली को सुनने के बाद दोनों की मुलाकात हुई, जो आगे चलकर प्रेम और विवाह में बदल गई। शादी के बाद उन्होंने सक्रिय पार्श्वगायन से कुछ दूरी बना ली, लेकिन दोनों ने साथ मिलकर नियमित रूप से लाइव शो किए और कई निजी एल्बम तैयार किए। परिवार में उनकी भारतीय-बांग्लादेशी पत्नी और एक बेटा निहाल, जो स्वयं संगीतकार हैं, शामिल हैं।
भूपिंदर सिंह ने फिल्म संगीत के साथ-साथ गजलों की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज की गंभीरता, शब्दों की संवेदनशील प्रस्तुति और सुरों पर असाधारण पकड़ ने उन्हें भारतीय संगीत जगत के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल किया।
साल 2022 में मुंबई में 18 जुलाई को 82 साल की आयु में उनका निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थे और उनकी पत्नी मिताली के अनुसार निधन से पहले नौ दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ और भारतीय संगीत जगत ने अपनी सबसे अलग और प्रभावशाली आवाज़ों में से एक को खो दिया।
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Created On :   17 July 2026 11:23 PM IST












