डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 की उम्र में फतह किया माउंट एवरेस्ट, बोलीं- एवरेस्ट ने ली हर स्तर पर परीक्षा

डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 की उम्र में फतह किया माउंट एवरेस्ट, बोलीं- एवरेस्ट ने ली हर स्तर पर परीक्षा
तमिलनाडु की पर्वतारोही डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 वर्ष की उम्र पार करने के बाद वह कर दिखाया, जिसे करने का सपना भी बहुत कम लोग देखते हैं। महज छह से सात महीनों के भीतर उन्होंने दुनिया की दो बड़ी और चुनौतीपूर्ण पर्वत चोटियों (माउंट मानसलू और माउंट एवरेस्ट) पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर एक नई मिसाल कायम की है।

चेन्नई, 9 जून (आईएएनएस)। तमिलनाडु की पर्वतारोही डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 वर्ष की उम्र पार करने के बाद वह कर दिखाया, जिसे करने का सपना भी बहुत कम लोग देखते हैं। महज छह से सात महीनों के भीतर उन्होंने दुनिया की दो बड़ी और चुनौतीपूर्ण पर्वत चोटियों (माउंट मानसलू और माउंट एवरेस्ट) पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर एक नई मिसाल कायम की है।

डॉ. प्रिया सेल्वराज ने आईएएनएस से कहा कि पर्वतारोहण की ओर उनका झुकाव जीवन के एक ऐसे दौर में हुआ, जब उन्हें समय, अवसर और सही मानसिकता मिली। उन्होंने पहाड़ों को अपनी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सेहत के लिए एक आश्रय के रूप में देखा। शुरुआत ट्रैकिंग से हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने पर्वतारोहण की तकनीकी बारीकियां सीखीं और पेशेवर प्रशिक्षण लेना शुरू किया।

उन्होंने बताया कि अपने कोच के मार्गदर्शन में उन्होंने शारीरिक और तकनीकी दोनों तरह की तैयारी की। अब तक वह चार बड़े अभियानों के लिए प्रशिक्षण ले चुकी हैं। उनकी पहली बड़ी पसंद माउंट मानसलू थी, जिसे 'माउंटेन ऑफ स्पिरिट' यानी आध्यात्मिकता का पर्वत कहा जाता है।

डॉ. प्रिया सेल्वराज के अनुसार, दुनिया की 8,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली 14 सबसे ऊंची चोटियों की ओर कदम बढ़ाने से पहले मानसलु पर चढ़ाई करना एक आदर्श शुरुआत मानी जाती है।

उन्होंने बताया कि यह यात्रा उनके लिए केवल एक पर्वतारोहण अभियान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव थी। तीन सप्ताह में उन्होंने इस चोटी को फतह किया और जब वापस लौटीं तो खुद को पहले से अधिक स्पष्ट सोच वाला, ऊर्जावान और बदला हुआ व्यक्ति महसूस किया।

मानसलू के बाद सभी ने उन्हें माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की सलाह दी। हालांकि, एवरेस्ट शुरू में उनकी व्यक्तिगत पसंद नहीं था, लेकिन अनुकूल मौसम और विशेषज्ञों की सलाह को देखते हुए उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की। चीन से अनुमति न मिलने के कारण उन्हें एवरेस्ट के दक्षिणी मार्ग से चढ़ाई करनी पड़ी, जो सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला रास्ता है।

डॉ. प्रिया सेल्वराज ने कहा कि माउंट एवरेस्ट का अनुभव उनके जीवन का सबसे कठिन, चुनौतीपूर्ण और परिवर्तनकारी अनुभव रहा। मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक हर स्तर पर एवरेस्ट ने उनकी परीक्षा ली। उन्होंने कहा कि अगर किसी एक पर्वत को सबसे ऊपर रखा जाए तो वह निश्चित रूप से एवरेस्ट होगा।

चढ़ाई के दौरान उन्हें कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब खराब मौसम के कारण उन्हें 'डेथ जोन' में एक अतिरिक्त रात बितानी पड़ी। वहां न भूख लगती है, न शरीर में ऊर्जा बचती है, लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

सबसे खतरनाक अनुभव उन्हें वापसी के दौरान खुम्बू आइसफॉल क्षेत्र में हुआ, जिसे दुनिया के सबसे जोखिम भरे पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां वह एक गहरी दरार (क्रेविस) में गिर गईं। डॉ. डॉ. प्रिया सेल्वराज ने बताया कि उनके गाइड अनुप गुरु ने पहले ही उन्हें सुरक्षा रस्सी लगाने का निर्देश दिया था। उसी सुरक्षा रस्सी ने उनकी जान बचाई।

उन्होंने कहा कि यदि उन्होंने गाइड की बात न मानी होती तो शायद वह आज जीवित नहीं होतीं। उनके गाइड ने अपनी ताकत और सूझबूझ से उन्हें बाहर निकाला। इस अनुभव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति मौत के इतने करीब जाकर वापस लौटता है, तो उसका जीवन देखने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है।

भविष्य की योजनाओं पर डॉ. प्रिया सेल्वराज ने कहा कि वह कभी बड़े लक्ष्य तय करके नहीं चलतीं, बल्कि परिस्थितियों और अवसरों के साथ आगे बढ़ती हैं।

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Created On :   10 Jun 2026 12:14 AM IST

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