मानवाधिकार संस्थाओं को उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जो अपनी बात सबसे कम रख पाते हैं सीजेआई सूर्यकांत
नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि मानवाधिकार संस्था की असल पहचान सिर्फ उसके द्वारा निपटाए गए मामलों की संख्या से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि क्या वह उन लोगों की बात सुन पाती है जो अपनी बात रखने में सबसे कम सक्षम हैं।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए सीजेआई कांत ने कहा कि आयोग एक नए विचार से आगे बढ़कर न्याय चाहने वालों के लिए एक भरोसेमंद संस्था बन गया है। साथ ही, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गरिमा, समानता, आजादी और न्याय की संवैधानिक गारंटी को रोजमर्रा की हकीकत में बदलना जरूरी है।
सीजेआई ने कहा, "संस्थाओं को भी लोगों की तरह उनके जन्मदिन पर ही सबसे बेहतर समझा जा सकता है। हम पीछे मुड़कर देखते हैं कि उन्होंने कहां से शुरुआत की थी, हम आसपास देखते हैं कि वे अभी कहां खड़ी हैं और हम आगे देखते हैं कि जिन लोगों की वे सेवा करती हैं, उनके प्रति उनकी क्या जिम्मेदारियां हैं।"
एनएचआरसी के पिछले 33 सालों के सफर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि आयोग ने 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए और 23 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा किया, जिसकी निपटारा दर 98 प्रतिशत से अधिक रही।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, "ये आंकड़े सिर्फ संस्था के काम को नहीं दिखाते, बल्कि उन कई मामलों को भी दर्शाते हैं जिनमें गंभीर उल्लंघन को लोगों के सामने लाया गया है।"
उन्होंने कहा कि एनएचआरसी की भूमिका उन लोगों के लिए बहुत अहम है जो दूर-दराज के जिलों में रहते हैं और जिनके लिए अदालत तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने आयोग को उन संस्थाओं में से एक बताया जो यह सुनिश्चित करती है कि संविधान में किए गए वादे उन लोगों तक पहुंचें जिन्हें उनकी सबसे अधिक जरूरत है।
उन्होंने कहा, "अगर संविधान एक वादा है, तो आयोग उसके रखवालों में से एक है। यह उन लोगों की बात सुनता है जो आसानी से अपनी बात नहीं कह पाते और यह बिना किसी के कहे खुद भी कार्रवाई कर सकता है।"
सीजेआई ने कहा कि मानवाधिकारों की सुरक्षा का दायरा सिर्फ उल्लंघनों की पहचान करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें जवाबदेही तय करना, प्रभावित लोगों को सार्थक राहत देना और ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए बदलाव करना भी शामिल होना चाहिए।
हिरासत में यातना और मौत, बंधुआ मजदूरी, सिलिकोसिस जैसी औद्योगिक बीमारियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों के अधिकारों से जुड़े मामलों में मानवाधिकारों की शीर्ष संस्था के दखल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे काम उल्लंघनों और सिस्टम की कमियों को दूर करने में संस्थागत दखल की अहमियत को दिखाते हैं।
समाज के सबसे कमजोर वर्गों पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर देते हुए सीजेआई ने कहा कि जो अधिकार ताकतवर लोगों के काम तो आता है लेकिन कमजोर लोगों के लिए बेकार साबित होता है, उसे सही मायनों में अधिकार नहीं माना जा सकता। यह बेहतर ब्रांडिंग वाली एक सुविधा है।
उन्होंने ऐसे लोगों का जिक्र किया जिनके अधिकारों पर संस्थागत स्तर पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, जैसे कि ऐसे विचाराधीन कैदी जो कभी अपने वकीलों से नहीं मिले, बिना दस्तावेजों वाले प्रवासी मजदूर, परिवारों द्वारा छोड़े गए बुज़ुर्ग, मुश्किलों का सामना कर रहे दिव्यांग लोग और ऐसी महिलाएं जिनकी परेशानियां उन्हें सुरक्षा देने वाले सिस्टम की नजर में नहीं आ पातीं।
सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि प्रभावित समुदायों के करीब होने के कारण, स्थानीय स्तर पर अधिकारों के उल्लंघन के मामलों को सुलझाने में राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका बहुत अहम है। उन्होंने कहा, "भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में अधिकारों का अनुभव अक्सर राजधानी में नहीं, बल्कि किसी दूरदराज के गांव, किसी खास इलाके या यहां तक कि घर के भीतर होता है।"
सीजेआई ने कहा कि जहां राष्ट्रीय आयोग मानक तय कर सकता है और बड़े स्तर के पैटर्न की ओर ध्यान दिला सकता है, वहीं राज्य आयोग अक्सर स्थानीय भाषाओं में शिकायतें सुनने, प्रभावित इलाकों तक पहुंचने और उन हालात को समझने के लिए बेहतर स्थिति में होते हैं जिनमें अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
सीजेआई कांत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा में अलग-अलग संस्थाओं की एक-दूसरे की पूरक जिम्मेदारियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो अदालतों को दखल देना चाहिए, जबकि मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच करनी चाहिए, सिस्टम की कमियों की पहचान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन चिंताओं पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता, उन पर संस्थागत स्तर पर ध्यान दिया जाए।
एनएचआआरसी ने "पानी जीवन का अमृत: पानी के अधिकार के जरिए मानवीय गरिमा को बढ़ावा देना" विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ अपना 33वां स्थापना दिवस मनाया। इस सम्मेलन में जल निकायों के संरक्षण और बहाली, तथा सभी के लिए पानी तक सुरक्षित और टिकाऊ पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पीने के पानी के स्रोतों की सुरक्षा पर चर्चा की गई।
पानी पर राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ स्थापना दिवस मनाने के लिए एनएचआरसी की सराहना करते हुए सीजेआई ने कहा कि मानवाधिकार केवल अमूर्त सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन से गहराई से जुड़े हैं।
उन्होंने कहा, "वे उतने ही ठोस हैं जितना किसी बच्चे के हाथ में साफ पानी का गिलास और उतने ही जरूरी हैं जितनी उस बच्चे को लगने वाली प्यास।"
स्थापना दिवस समारोह में एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन, सदस्य जस्टिस (डॉ.) विद्युत रंजन सारंगी, विजया भारती सयानी और प्रियंक कानूनगो, महासचिव पीयूष गोयल, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य शामिल हुए।
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Created On :   12 Oct 2026 12:56 PM IST












