जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को लगाई फटकार, पिता से बच्ची को लाने के लिए पुलिस को दिया था आदेश

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को लगाई फटकार, पिता से बच्ची को लाने के लिए पुलिस को दिया था आदेश
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने श्रीनगर की एक फैमिली कोर्ट को पांच साल की बच्ची को उसके पिता से वापस लाने के लिए पुलिस भेजने के मामले में फटकार लगाई है।

श्रीनगर, 22 अगस्त (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने श्रीनगर की एक फैमिली कोर्ट को पांच साल की बच्ची को उसके पिता से वापस लाने के लिए पुलिस भेजने के मामले में फटकार लगाई है।

न्यायमूर्ति राहुल भारती ने अपने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट ने सर्च वारंट जारी करने और पुलिस को बच्ची को लाने का निर्देश देने में कानूनी कमियां और संवेदनहीनता दिखाई।

यह मामला शादाब हुसैन मीर द्वारा संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका से जुड़ा है। न्यायमूर्ति भारती ने कहा कि केवल पिता के पास बच्चे की कस्टडी होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता और उनकी पूर्व पत्नी ने 25 जनवरी 2025 को आपसी समझौते के तहत तलाक लिया था। समझौते के अनुसार उनकी नाबालिग बेटी की कस्टडी मां को दी गई थी, लेकिन यह शर्त भी रखी गई थी कि अगर मां दोबारा शादी करती है तो बच्ची की कस्टडी पिता को मिल जाएगी।

मां के दोबारा विवाह करने के बाद पिता ने बच्ची को अपने पास रख लिया। इसके बाद मां ने श्रीनगर की चौथी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फैमिली कोर्ट) के समक्ष याचिका दायर की। 29 जून 2026 को फैमिली कोर्ट ने चनापोरा पुलिस थाने के एसएचओ को सर्च वारंट लागू करने, बच्ची को बरामद करने और उसे मां को सौंपने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि पिता दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के अनुसार एक जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका निभा रहे थे। मां के पुनर्विवाह के बाद उनकी कस्टडी को पहली नजर में गलत या गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

न्यायमूर्ति भारती ने निचली अदालत की आलोचना करते हुए कहा कि पिता का पक्ष सुने बिना और तथ्यों की पूरी जांच किए बिना एकतरफा सर्च वारंट जारी कर दिया गया। उन्होंने कहा कि बच्ची को लाने के लिए पिता के घर पुलिस भेजना न्यायिक संवेदनहीनता को दर्शाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि बच्ची को वापस लाना जरूरी था, तो इसके लिए स्थानीय पुलिस थाने को भेजने के बजाय महिला पुलिस सेल या अन्य संवेदनशील और उचित उपायों का सहारा लिया जाना चाहिए था।

पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि क्या फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 100 के तहत शक्तियों का उपयोग करने का अधिकार है।

न्यायमूर्ति भारती ने कहा कि धारा 100 के तहत सर्च वारंट जारी करने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को होता है, फैमिली कोर्ट को नहीं।

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Created On :   22 Aug 2026 11:59 PM IST

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